बन चन्द्र निकला रातों में
निशा हुयी चंचल बातों में
बेला कुमुदिनी खिलने लगी
वनस्पति तालों प्रपातों में
चाह निशा की रमण के लिये
प्रियतम संग भ्रमण के लिये
वो चन्द्र के संग अलसायी
तम मरुथल में स्फुरण के लिये
निशा हुयी है पूर्ण समर्पित
सर्वस्व कर रही है अर्पित
प्रणय पाश में बंधकर करके
चन्द्र प्रिया बनकर है चर्चित
पुष्पित बेला है उपवन में
महक छा रही गांव व वन में
चन्द्र की चंचल किरणों से
प्रेम लहर बेला के तन में
बेला की सुगंध है ऐसे
भूल गयी मर्यादा जैसे
चर्चा उपवन में वो पायी
चन्द्र प्रियतमा हो वो जैसे
चन्द्र रूप जब नभ पर आया
धरा कुमुदिनी को मन भाया
सम जल में वो थिरक रही है
प्रियतम से हो स्पंदन पाया
रजत वर्ण से सज धज करके
प्रिय के रूप में रम करके
आनन्दित हो गयी कुमुदिनी
चन्द्र को हिय में रख करके
चन्द्र प्रभा आयी जब थल में
पुष्पित वस्पतियाँ थल जल में
चन्द्र रूप से मोहित होकर
वो नृत्य मग्न जल कल- कल में
भाव विभोर हुयी वनस्पतियाँ
जब प्रिय के संग वास किया
झूम उठी वो आनन्दित हो
जब नभ ने प्रिय संदेश दिया
विकास पाण्डेय
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