Friday, October 9, 2020

बन चन्द्र निकला रातों में

बन चन्द्र निकला रातों में
निशा हुयी चंचल बातों में
बेला कुमुदिनी खिलने लगी
वनस्पति तालों प्रपातों में

चाह निशा की रमण के लिये
प्रियतम संग भ्रमण के लिये
वो चन्द्र के संग अलसायी
तम मरुथल में स्फुरण के लिये

निशा हुयी है पूर्ण समर्पित
सर्वस्व कर रही है अर्पित
प्रणय पाश में बंधकर करके
चन्द्र प्रिया बनकर है चर्चित


पुष्पित बेला है उपवन में
महक छा रही गांव व वन में
चन्द्र की चंचल किरणों से
प्रेम लहर बेला के तन में


बेला की सुगंध है ऐसे
भूल गयी मर्यादा जैसे
चर्चा उपवन में वो पायी
चन्द्र प्रियतमा हो वो जैसे


चन्द्र रूप जब नभ पर आया
धरा कुमुदिनी को मन भाया
सम जल में वो थिरक रही है
प्रियतम से हो स्पंदन पाया


रजत वर्ण से सज धज करके
प्रिय के रूप में रम करके
आनन्दित हो गयी कुमुदिनी
चन्द्र को हिय में रख करके


चन्द्र प्रभा आयी जब थल में
पुष्पित वस्पतियाँ थल जल में
चन्द्र रूप से मोहित होकर
वो नृत्य मग्न जल कल- कल में



भाव विभोर हुयी वनस्पतियाँ
जब प्रिय के संग वास किया
झूम उठी वो आनन्दित हो
जब नभ ने प्रिय संदेश दिया




विकास पाण्डेय

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