Monday, October 16, 2017

आओ चलो कुछ दीप जलाये

आओ चलो कुछ दीप जलाये
ज्योति से ज्योति मिल जाये
दीपों की ऐसी कड़ी बनाये
रवाली है जिनकी गागर
लाई खिलौना डाल के आये
रोता है सड़कों पर जो जीवन
उसे फुलझड़ी हम पकड़ाये





आओ चलो कुछ दीप जलाये
ज्योति से ज्योति मिल जाये
दीपों की ऐसी कड़ी बनाये


फैला है जहाँ अन्धेरा
चलो वहाँ दीपक बन जाये
अन्धकार से हुये भ्रमित जो
आओ उन्हें हम मार्ग दिखाये
मिट जाये अन्धेरा मन का
ऐसे कुछ हम दीप जलाये


आओ चलो कुछ दीप जलाये
ज्योति से ज्योति मिल जाये
दीपों की ऐसी कड़ी बनाये





तिमिर से खुशियां भटक न जाये
चलो उन्हे हम मार्ग दिखाये
प्रेम समर्पण शान्ति त्याग के
कुछ ऐसे हम दीप जलाये
आये खुशियां सबके जीवन में
और धरा स्वर्ग बन जाये



आओ चलो कुछ दीप जलाये
ज्योति से ज्योति मिल जाये
दीपों की ऐसी कड़ी बनाये



विकास पाण्डेय

Thursday, June 22, 2017

मुक्तक

मेरे चेहरे की चमक देखकर मुझसे दूर जाने लगे हैं।
कभी पास आने की जिद थी अब कतराने लगे हैं॥


अन्ना को चाहिये लोकपाल।
मुझको चाहिये ठोंकपाल।।



परीक्षा थी मेरे हौसले के परों की।
चाहत थी मुझे चांद पर घरों की।।



फागुन की नरमी हैं
होली की गरमी हैं
हाथों में रंग-गुलाल
बस थोडी बेशरमी हैं




मेरे गीतों में वो छाने लगे है,
मेरे सपनों में दुनियाँ बसाने लगे है।
कल तक जिन्हें चाहत थी दूर जाने की,
अब हमें सपनों में अपने बसाने लगे है॥




कलियों से खुशबू आयी हैं
तन मन में उमंग छायी हैं

मदहोश है वो

मदहोश है वो उन्हें मेरी खबर नही है
सोचते है कि डूब जायेगी मेरी नाव
पर मेरी राह में कोई भंवर नही है

अहं के शिखर पर बैठने वालो
जरा झुक के देखो
तुम्हारे लिये उतरने की
कोई डगर नही है

साजिशें रचना तो
फितरत तुम्हारी है
तुम्हारी हरकतों से मैं
बेखबर भी नही हूँ

तुम्हे अच्छी लगती है
रबड़ की मुहरें
मैं रबड़ से बनी
मुहर भी नही हूँ

मेरा नाम मेरी पहचान है
मेरा नाम अपनों की शान है,
मेरे नाम में बसती है एक दुनिया
मेरा नाम मेरे अपनों की जान है,
जीते है कुछ चेहरे मेरे लिये
मेरे नाम के बिना
उनकी दुनिया सुनसान है,

विकास पान्डेय