वो मेघ तो थे नही
जो दूत बन जाते
वो तो पंक्षी थे
क्यों न पंख फडफड़ाते
वो प्रकाश के
थे आदी
क्यों चन्द्र बनकर
अन्धेरे से दोस्ती
निभाते
चले जब हम
फूलों की डगर पर
साथ थे वो
साये की तरह
काँटों की डगर पर भी
क्यों अपना वो हक
जताते
जो दूत बन जाते
वो तो पंक्षी थे
क्यों न पंख फडफड़ाते
वो प्रकाश के
थे आदी
क्यों चन्द्र बनकर
अन्धेरे से दोस्ती
निभाते
चले जब हम
फूलों की डगर पर
साथ थे वो
साये की तरह
काँटों की डगर पर भी
क्यों अपना वो हक
जताते