मैं एक चातक जैसा हूं
Saturday, March 26, 2016
वो मेघ तो थे नही
वो मेघ तो थे नही
जो दूत बन जाते
वो तो पंक्षी थे
क्यों न पंख फडफड़ाते
वो प्रकाश के
थे आदी
क्यों चन्द्र बनकर
अन्धेरे से दोस्ती
निभाते
चले जब हम
फूलों की डगर पर
साथ थे वो
साये की तरह
काँटों की डगर पर भी
क्यों अपना वो हक
जताते
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