Thursday, December 31, 2015

जब अपनी बातें होंगी जब अपनी मुलाकातें होंगी

जब अपनी बातें होंगी
जब अपनी मुलाकातें होंगी



कुछ खट्टे मीठे पल होंगे
कुछ प्यार भरी सौगातें होंगी
कुछ तेरे दिन होंगे
कुछ मेरी रातें होंगी



जब अपनी बातें होंगी
जब अपनी मुलाकातें होंगी



जब अपनी बातें होंगी
जब अपनी मुलाकातें होंगी



यादों की तुम चादर ओढ़े
जब मेरे सामने आना
मेरी कुछ सुन लेना
अपनी भी कहते जाना



जब अपनी बातें होंगी
जब अपनी मुलाकातें होंगी



मेरे मन के फव्वारे से
जल की बूँदें निकल रही हैं
बादल हो जो मन में तुम्हारे
उनको तुम बरसा जाना



जब अपनी बातें होंगी
जब अपनी मुलाकातें होंगी



विकास पाण्डेय


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अब मैं नागों को दूध पिलाता नहीं हूँ

अब मैं नागों को
दूध पिलाता नहीं हूँ
व्यर्थ का शोर
मचाता नहीं हूँ
कदम बढ़ाता हूँ
लक्ष्य की ओर
लक्ष्य का शोर
मचाता नहीं हूँ

अब मैं नागों को
दूध पिलाता नहीं हूँ



नागों को आईना
दिखाता नहीं हूँ
कल तक थे
जो मेरे निकट
अब मैं उनको अपना
बताता नहीं हूँ

अब मैं नागों को
दूध पिलाता नहीं हूँ



कल तक थे
वो मेरे निकट
अब मैं उनको
अपनी आस्तीन
छिपाता नहीं हूँ

अब मैं नागों को
दूध पिलाता नहीं हूँ





विकास पाण्डेय





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Tuesday, December 29, 2015

आप के अन्दाज से आम आदमी चकरा गया 


आप के अन्दाज से
आम आदमी चकरा गया
आप को देखा तो
दिल्ली को पसीना आ गया






आम आदमी खुश हुआ
आम आदमी आ गया
देख करके खिलाड़ी
आम आदमी चकरा गया
कल तक था जो
त्याग कि मूर्ति बना हुआ
आज वह चारा घोटाला
वालों के निकट आ गया







 रात के अन्धेरे में
देखकर जुगनूँ की चमक
आम आदमी ने
दीयें सभी बुझा दिये
आम आदमी के
जीवन में अन्धेरा छा गया
आप के अन्दाज से
आम आदमी चकरा गया






कल तक थे जो निर्भया के लिये
मोमबत्ती थामें हुयें
आज उन्हें एक बलत्कारी को
सिलाई  मशीन देना भा गया
आप के अन्दाज से
आम आदमी चकरा गया






कल तक कहता था जो
आधे वेतन से इतिहास बनाऊँगा
वो ईमानदारी के नाम पर
अपना वेतन-भत्ता बढा गया
आप के अन्दाज से
आम आदमी चकरा गया



 जो स्वयं भटके हुये है
वो मार्ग क्या बतलायेंगे
स्वयं कहा जायेंगे
दूसरों को कहाँ पहुँचायेंगे




आप के वादे अभी
सच हुये साबित नहीं
रुक कर थोड़ा देख लूँ
आप क्या-क्या दिन दिखलायेंगे




 कुछ नये आरोपों की
क्या कोई गठरी लायेंगे
या पुराने आरोपों से
आप काम चलायेंगे





आप की यह अदा भी
हमको तो अच्छी लगी
करना हमको कुछ भी नही
बस अरोपों से काम चलायेंगे







आप के अन्दाज से
आम आदमी चकरा गया
आप को देखा तो
दिल्ली को पसीना आ गया



विकास पाण्डेय


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Thursday, December 24, 2015

बन गये रत्न भारत के तुम ज्योतिपुंज आरती के तुम

पूर्व प्रधानमंत्री भारत रत्न श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी को उन्के जन्मदिन 25 दिसम्बर की हार्दिक शुभकामनायें।

उनके जन्मदिन के अवसर पर मैं अपनी इस छोटी सी कविता के माध्यम से उन्हे शुभकामनायें एवं सम्मान देना चाहूँगा।

बन गये रत्न भारत के तुम
ज्योतिपुंज आरती के तुम

तुम्हारे विचारों की कोमल लताये
हैं सर्वत्र लटक रही
अपने प्याारे अटल के लिये
मानवता है तडप रही

क्यों अपनों से
तुमने मुँह मोड लिया
अपने सपनों की नौका को
क्यों मझधार में छोड दिया

राजनीति के गलियारों को
तुमने ऐसे छोड दिया
जैसे प्राणों ने जीवन से
अपना नाता तोड लिया

बन तपस्वी, बन वनवासी
एकान्तवास के अभिलाषी

मानवता के देवदूत
भारत माँ के सपूत

अटल नाम का सूरज न हो
वह सुबह नही होने देंगे
लाखों आँधी तूफान आये
तुम्हारे आभा मण्डल की
चमक नही खोने देंगे

आने वाले युगों-युगों तक
तुम्हें पुकारा जायेगा
भारत भूमि का कण-कण
अटल-अटल दुहरायेगा

विकास पाण्डेय

Sunday, December 20, 2015

गंगा

मोक्षदायिनी गंगा है,
वर प्रदायिनी गंगा है,
सींचे है लाखों प्राणों को,
जीवन प्रदायिनी गंगा है,

 गंगा का वैभव
सुनाऊँ मैं कैसे
सूर्य के समक्ष
दीपक हूँ जैसे

जनपद काल से
अब तक
गंगा की निर्मल धारा ने

जनपद काल का
वैभव देखा
मुगलों का भी
उद्‌भव देखा
देखी हैं
अंग्रेजों की सत्ता
देखा है
गाँधी का प्रण
देखे हैं
आन्दोलन के क्षण

 सन सत्तावान से
सैतालीस तक
अपने प्यारे लालों का
बहता हुआ
रक्त भी देखा

मोक्षदायिनी गंगा है,
वर प्रदायिनी गंगा है,
सींचे है लाखों प्राणों को,
जीवन प्रदायिनी गंगा है,



 हरिद्वार में
अलख जगायी है
कानपुर की
प्यास बुझायी है
बन्दी माता के मन्दिर का
अद्भुत सौन्दर्य बढ़ाया है
बिठूर के पावन तट ने भी
तेरा वैभव गया है


हे! गंगा तुमने
अनासक्त भाव से
सबको ह्रदय लगाया है
असनी का
मान बढ़ाया है
कौशाम्बी ने
वैभव पाया है
प्रयाग के मस्तक पर
तिलक लगाया है
वाराणसी को
अध्यात्म गुरू का
मान दिलाया है
पटना से बंगाल तक
लाखों का जीवन हर्षाया है



भारत के जन-जन ने
माँ तुझको शीश झुकाया है
सबका मन हर्षाया है
आशा के दीप जलाया है






Monday, September 28, 2015

यमुना जी कर रही पुकार 

यमुना जी कर रही पुकार
मुझ पर भी अब करो विचार


मेरा जल है कृष्ण की लीला
का आधार
किया है मैने मानव जाति की
कई पीढ़ियों का उद्धार




यमुना का जल हमसे कहता है
आने वाला पल हमसे कहता है



कान्हा की प्यारी यमुना
विकास की कहानी यमुना



यमुना तट पर दिल्ली
मथुरावासी देखो
बलुआघाट प्रयाग में
बसे हुये सन्यासी देखो



दिल्ली की प्यास बुझाती है
मथुरा में प्रेम बढ़ाती है
कौशांबी से चलकर के
बलुआ घाट प्रयाग की
चमक बढ़ाती है


प्रीत योग का सार है
यमुना का जल प्रेम का आधार है



यमुना का सुन्दर नीला जल
कहता है हमसे हर पल


लाभ में अन्धे मत हो जाओं
कुछ अपना तुम कर्तत्य
निभाओ
सींचा है मैने तेरे जीवन को
मेरा तुम अस्तित्व बचाओ

Monday, September 7, 2015

कोई लोकपाल चिल्लाता है 

कोई लोकपाल चिल्लाता है
कोई आरक्षण की अलख जगाता है,
आम आदमी जी रहा है कष्टों में
कोई इनकी पीड़ा और बढ़ाता है,

गुजरात में आग लगाई है
लगता है तेरी आंखे भी ललचाई है,
अमृत की चाहत में तुमने
विष की लता फैलाई है,

बहुत जल चुका देश मेरा
अब और नहीं जलने दूँगा,
जल रहा है दीप राष्ट्र गौरव का
इसे नहीं बूझने दूँगा,

देश मेरा स्वर्ग बने न बने
नर्क नही बनने दूँगा
प्रेम का दीप जले न जले
नफरत का दीप नही जलने दूँगा
राम का राज बसे न बसे
लंका को नही बसने दूँगा

Saturday, August 22, 2015

दो दिन मेरे  संग चले हो 

दो दिन मेरे
संग चले हो
कहते हो - जनम-जनम
का वादा कर दो,


खाली है
सपनों की गागर
तुम इसको
विश्वास से भर दो,







कंकरीले- पथरीले
रस्तों को
पुष्पों की तुम
चादर कर दो,





अपना यज्ञ, त्याग
तपोबल
सादर मुझे
समर्पित कर दो,



नही हुये तुम मेरे
कहते हो
अपना जीवन
मेरे नाम पर कर दो,







मुझे बनाना है अपना
तो तुम मेरे ही
संग में हो लो,












विकास पाण्डेय









Friday, August 14, 2015

मुक्त धरा है  मुक्त गगन है 

मुक्त धरा है
मुक्त गगन है
मुक्त है अपना
दाना पानी
अंत हुआ
गोरों का शासन
बन्द हुआ है
कालापानी
नहीं रहा अब
मनमानापन
भाग गये हैं
अभिमानी

किया जिन्होंने
जीवन अर्पित
उन्हें हैं ये
शब्द समर्पित

.
सीमा पर जो
पड़े हुये हैं
प्रहरी बनकर
खडे हुये हैं
शत्रु नही
आने पायेगा
बन हिमालय
अडे हुये है

उन वीरों के
सम्मान में
राष्ट्र के
अभिमान पर

किया जिन्होंने
जीवन अर्पित
उन्हें हैं ये
शब्द समर्पित

समस्त देशवासियों को स्वतंत्रता दिवस (15 अगस्त) की हार्दिक शुभकामनायें।


Vikash Pandey

Kanpur

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Tuesday, August 11, 2015

कहां भी कुछ नही तुमसे  नही हो दूर तुम मनसे, 


मेरी चाहत तुम्हारी भी
ज़ुबां पर सज गयी है,
रंगो से रंग करके
कहानी बन गयी है,






कभी अपनो की महफिल में,
कभी गैरों की महफिल में,
चर्चा वहां पर आम होता है,
मेरा ही नाम अब तो वहाँ पर
प्यार का पैगाम होता है,    







तेरे आँचल में भी तो
मेरी यादों की कलियाँ है,
जहाँ पर थी कभी महफिल
वहाँ अब सूनी गलियाँ है,







 डूब जाओगे तुम मेरी
चाहत के समन्दर में,
मेरी यादों की कलियों को
अपने दिल में पा करके,
बसा लेना तुम अपनी
सुन्दर सी दुनियाँ
मेरे सपनों में आ करके,







कहां भी कुछ नही तुमसे
नही हो दूर तुम मनसे,
तेरा अब नाम किस्सों में
भी तो है जुड़ गया हमसे,
छिपाना सीख लेना है
तेरी चाहत को इस जगसे,

Tuesday, July 28, 2015

संगीत का  साज हो  रणभेरी की  आवाज हो, 

संगीत का साज हो
रणभेरी की आवाज हो,
बादलों का राज हो
प्रेम का आगाज हो,




सभी में हैं ईश्वर की छाया,
सभी ने हैं परम तत्व को पाया,



पुष्प की खिलन हो,
प्रेमियों का मिलन हो,
शत्रुओं की जलन हो,
समाज का चलन हो,




सभी में हैं ईश्वर की छाया,
सभी ने हैं परम तत्व को पाया,



सागर की लहर हो,
समय का प्रहर हो,
चक्रवात का कहर हो,
नदी या नहर हो,




सभी में हैं.ईश्वर की छाया,
सभी ने हैं परम तत्व को पाया,




उपवन के फूल हो,
भूमि की धूल हो,
नागफनी के शूल हो,
शिखर या मूल हो,




सभी में हैं ईश्वर की छाया,
सभी ने हैं परम तत्व को पाया,



रत्नों की चमक हो,
स्वर्ण की खनक हो,
सूर्य की रमक हो,
विद्युत की दमक हो,





सभी में हैं ईश्वर की छाया,
सभी ने हैं परम तत्व को पाया,



पानी में नाँव हो,
पेड़ों की छाँव हो,
नगरों से दूर गाँव हो,
कौवे की काँव-काँव हो,




सभी में हैं ईश्वर की छाया,
सभी ने हैं परम तत्व को पाया,






Vikash Pandey

Kanpur

Saturday, July 11, 2015

ये माना  कि  धरा पर हम  राज करते नहीं, 

ये माना  कि
धरा पर हम
राज करते नहीं,
ऐसा नहीं की
हम किसी के
ह्रदय में
बसते नहीं,
कुछ ह्रदय के  
राज्य है हमारे लिये
राज वहाँ शासकों के
चलते नहीं,




सिंहासन मिट जायेगे,
मुकुट गिर जायेगे,
राज धरा का भी
एक दिन मिट जायेगा,






शासक ह्रदय के
कभी भी है
मरते नहीं,
राज अपना
नष्ट होने से
डरते नहीं,







यश हमारा ये
किवदंतियाँ
सुनाती रहेगी,
गाथा हमारी
सभी को
बताती रहेगी,



ये धन ये वैभव
सब मिट जायेगा,
नाम राजाओं के
कोई न दुहरायेगा,
भूल जायेंगे लोग
द्वारिकाधीश को
ग्वाला कृष्ण ही
जग में पूजा जायेगा,


Vikash Pandey

Kanpur

कुछ चिड़िया हमें देख चहचहाने लगी, 

कुछ चिड़िया हमें देख
चहचहाने लगी,
उपवन में है कोई
हस-हस के
सबको बताने लगी,




ये पंक्षी बहुत बदनाम है
जा जा कर
हर शाख पर
मेरे किस्से सभी को
सुनाने लगी,




कलियां हसने लगी
भांवरे हसने लगे,
पुष्प खिलने लगे
पत्ते हिलने लगे,







जिसने देखा मुझे
जिसने जाना मुझे
वो प्रेम, श्रद्धा से
झुकने लगे,




Vikash Pandey

Kanpur

Monday, July 6, 2015

हार गये जो मन रण से पहले,

हार गये जो मन
रण से पहले,
छोड़ गये जो
युद्धभूमि को
निर्णायक क्षण से
पहले,






उनकी क्या मैं
बात करूँ,
खुशियों के पल
क्यों बर्बाद करूँ,







वो हारे मन के योद्धा थे
रण का जिनमें था
जोश नही,
क्यों सम्मान करे
उनका जग
जग का इसमें
दोष नहीं,








जो कुँयें को ही
समझ बैठे है
सारा जग,
जिनके पास जग का
शब्दकोष नहीं,








जीता है उसने
जग को
जिसने है
हुँकार भरी,
योद्धाओं के
तीक्ष्ण बाणों से
जिसकी अन्तरात्मा
नही डरी,





Vikash Pandey

Kanpur

Sunday, July 5, 2015

हमने तो अभी कलम थामी है,

हमने तो अभी
कलम थामी है,
मेरे बारे में
कुछ कहना अभी
बेमानी है,
समय के शातिर
शिकंजे से
निकलकर
हमें अपनी भी
एक जमीन बनानी है,







तुम सोचते हो
हमारे भाग्य में
अंधेरे है,
मगर हमने तो
उजाले को भी
हराने की  ठानी है,






समय के पन्नों पर
लिखनी अपनी भी
एक कहानी है,







जो सहमा था
वो मेरा बचपन था
जिसने हवाओं से
लड़ने की ठानी है
वो मेरी जवानी है,
ऐ हवाओं मेरा
विरोध छोड़ दो
मेरे अतीत में
संघर्षों की एक
कहानी है,






Vikash Pandey

Kanpur

Monday, June 29, 2015

फूलों का खिलना एक कल्पना है,

फूलों का खिलना
एक कल्पना है,
वास्तविकता
तो मुर्झाना है,



सिर उठाकर
खड़ा होना
एक अहम है
वास्तविकता
तो झुक जाना है ,




फसलों का लहराना
क्षण भर की
अनुभूति हैं
वास्तविकता तो
पक जाना है,




बादल बनना तो
क्रिया मात्र है
वास्तविकता तो इसका
पानी बन जाना है,




विशालता तो हिमालय का
गर्व मात्र है इसे भी एक दिन
अपना अस्तित्व गवाँना है,





पेड खड़ा है तन करके
एक दिन इसको भी
गिर जाना है,





.आज जहाँ है
सागर की लहरें
वहाँ एक दिन
फसलों को
लहराना है,




Vikash Pandey

Kanpur

वर्षा की बूँदो के स्पर्श के स्पन्दन से,

वर्षा की बूँदो के
स्पर्श के स्पन्दन से,
लगता है जैसे
तपता तन लिपट गया हो
शीतल चन्दन से,



तपते तन को,
तपते मन को,




वर्षा की बूँदों की टप-टप
लगती है ऐसी
जैसे छन -छन हो पायल से,
जैसे खन - खन हो पायल से,



वर्षा की बूँदो के
स्पर्श के स्पन्दन से,
लगता है जैसे
तपता तन लिपट गया हो
शीतल चन्दन से,




भीगा तन है,
भीगा मन है,




मन मोर मयूरा बन करके
वर्षा की बूँदों से सज करके
भीगी धरती पर नाच रहा,
कोयल की कूँ-कूँ
चिडियों की चूँ-चूँ
लगती है ऐसे जैसे
वर्षा के स्वागत में
गीत मल्हार रहा,




पानी ले बादल घुमड़ रहे हैं,
जैसे योद्धा रण को उमड़ रहे हैं,





वन उपवन सब गीत गा रहे
वर्षा की बूँदों की अपनी
प्रीत गा रहे,
हार गयी सूरज की किरणें
बादलों की जीत गा रहे,



वर्षा की बूँदो के
स्पर्श के स्पन्दन से,
लगता है जैसे तपता तन
लिपट गया हो
शीतल चन्दन से,





Vikash Pandey

Kanpur

Wednesday, June 24, 2015

एक दिन सोचा चलो उपवन में जाये,

एक दिन सोचा चलो
उपवन में जाये,
पुष्पों और कलियों के
संग खिलखिलायें,


हमें देख कुछ कलियाँ
गुनगुनाने लगी,

कुछ मिलन की लगन
जगाने लगी,

कुछ अपने ह्रदय की  व्यथा को
सुनाने लगी,

कुछ हिचकिचाहट में मुख को
छिपाने लगी,

भौंरों को देख वो संकोच
जताने लगी,

भौरों के जाने की प्रतीक्षा में
समय को गवाँने लगी,


रात होने लगी,
भौंरे सोने लगे,

अब सभी कलियाँ हमसे मिल खिलखिलाने लगी,
भूल व्यथा वेदना मेरे संग
सुन्दर गीत गाने लगी,

रात्रि जाने लगी,
प्रातः होने लगी,

चल रही थी मीठी सुगन्धित पवन,
मन्दिरों में भी हो रहा था  हवन,

अब मेरी विदाई की बेला भी
आने लगी,
मेरी विदाई को निकट देखकर
वो विरह वेदना को सुनाने लगी,

एक कली थी अधखिली 

एक कली थी
 अधखिली

जिसका रस था
महकने लगा
जिसे देख
भौंरा बहकने लगा
जिसके लिये
दिन में थका
रातों को जगा
भाग्य भौंरे का
इतना प्रबल
भी न था
पा सके तो उसको
इतना सबल
भी न था


अब भौंरो की
महफिल भी
सजने लगी
रस कली का
चखने की
शर्त लगने लगी


कौन जीतेगा
कौन हारेगा
किसी को कुछ भी
न था पता


उधर एक क्वाँरी भी
ब्याहता हुयी
रात आयी थी वो
जिसके सपने लिये
वो थी आयी हुयी


बिछ गयी वो कली
जा उसके पलंग पर
लग गया उसका रस
नवब्याहता के अंग पर

रात महकी किसी की
जान निकली किसी की

लग गयी पंखुडियाँ भी
एक एक कर
कोमल से तन से
जो बसी हुयी थी
कितने भौंरो के मन में


नही था उसके जैसा सौन्दर्य
किसी के पास
अब इस भुवन में


भौंरे भी सपने सजाते रहे
उसको पाने की अलख
जगाते रहे
आयेगी फिर नया जन्म
लेकर कली
यह बात उपवन को
बताते रहे





Vikash Pandey

Kanpur

Monday, June 22, 2015

श्वेत के लिये जग भागे,

श्वेत के लिये जग भागे,
श्याम के लिये कोई न जागे,

आपके लिये ईश्वर का
उपहार हैं श्याम रंग,
लगता है श्याम पुष्पों के
रस से भरा अंग-प्रत्यंग,

आपके रुप में
दिखती है मुझको मधुशाला,
आपके यौवन में
दिखता है मुझको
आकर्षण का प्याला,

तुम सृष्टि में
वरदान हो पृकृति का,
मानव भेष में
किसी महान आकृति का,

स्याह रंग में रची है सृष्टि,
चाहे जहाँ डालो तुम दृष्टि,

सृष्टि से पहले
अन्धकार था,
समस्त सृष्टि में
स्याह का अधिकार था,

सृष्टि के बाद भी
अन्धकार होगा,
सृष्टि  मे सर्वत्र
स्याह का सत्कार होगा,




Vikash Pandey


Kanpur

कलियुग में मेरे साथ बड़ी बात हुयी

कलियुग में मेरे साथ बड़ी बात हुयी
त्रेता के चरित्र रावण से मेरी मुलाकात हुयी




रावण अहं ब्रह्म अस्मि चिल्लाया
आई एम आल्सो ए ब्राम्ह्मण
मैने उसे बताया





रावण ने कहा- संस्कृत में बताओ
मैने कहा राजभाषा में आ जाओ
वो भी हिन्दी में आया
मैने  अंग्रेजी का भूत भगाया




रावण ने पूँछा-
कौन सा युग है मुझे बताओ
मैंने कहा-
पॉकेट कैलेन्डर तो दिखाओ
रावण ने कहा-
राजा हूँ मै मुझे काम बताते हो
अपनी मृत्यु को बुलाते हो



उसने मुझे राजतंत्र की अकड़ दिरवायी
मैने उसे अपनी दिल्ली तक की पकड़ बतायी




मैने  कहा- राजाजी
अपने राजतंत्र को भूल जाओ
भारत में लोकतंत्र है
अपनी अकड़ न दिखाओ
राजाओं के प्रिवी पर्स छिन गये है
जो बच गये है वो भी दिन गिन रहे हैं





मैंने कहा-
इस युग में इतना गहना पहन कर शोर मचाओगे
किसी डकैत ने सुन लिया तो लंगोट में ही वापस जाओगे
तुम्हारी तलवार यहां काम नही आयेगी
जब ए० के० 47 अपना रूप दिखायेगी



यदि अधिक उपद्रव मचाओगे
तो रा०सु०का० में अन्दर जाओगे



मेरे विचारों ने कुछ प्रभाव दिखाया
रावण का गरम मस्तिष्क थोड़ा सा ठंडाया




मैने कहा-
अनुचित समय में पृथ्वी लोक में चले आये हो
लगता है स्वर्ग में उचित स्थान नही पाये हो




इन्द्र ने तुम्हारे विरुद्ध षड़यंत्र रचाया है
इसीलिये कलियुग में तुम्हें
पृथ्वी लोक का मार्ग दिखाया है




इस समय पृथ्वी पर
कलियुग की छत्रछाया है
नेताओं का वैभव
कोने-कोने में समाया है



इन नेताओं से देवराज भी डरते है
इनके कारण आजकल
पृथ्वी लोक पर नही उतरते है



मैं तुम्हे नेताओं के बारे में विस्तार से बताता हूँ
कलियुग के शासक नेताओं की चालीसा तुम्हें सुनाता हूं




आप मांस खाते थे
मदिरा पीते थे
आपके सहयोगी भी
आपकी को तरह जीते थे

आप शत्रुओं को मिटाते थे
मित्रों पर रत्न लुटाते थे




कलियुग के शासक नेता
समानता को आधार बनाते है
शत्रु और मित्र में
कोई अन्तर नही दिखाते है
शत्रुओं को भी
मित्रों के समान गले लगाते है
मित्रों को भी
शत्रुओं के समान चाट जाते है




मैने विस्तार से रावण को
नेता चालीसा सुनाया
मैंने एक आश्चर्यजनक
दृश्य पाया
रावण के आंखों में थी
आँसुओं की छाया



रावण ने कहा-
नेता चालीसा सुनकर
मेरी आँखे भर आयी है
कलियुग की महिमा देखकर
मेरी आँखे चौधियाई है



अब मुझे तुरन्त
अपने लोक है जाना
कलियुग में पुनः मुझे
पृथ्वी लोक नही आना




Vikash Pandey

Kanpur

चन्द्र की चंचल किरणें

चन्द्र की चंचल किरणें
आज भी हम तक आती है
कुछ पल सो लेते है
सारी रात जगाती है

चन्द्र की चंचल किरणें
अब भी मुझसे खेल रही है
जग के निष्ठुर नियमों
और तानों को झेल रही है


जिन किरणों ने मुझ पर
अपना सर्वस्व है वारा
कैसे निष्ठुर बनकर
मै उनसे करूं किनारा


वो प्रकाश से डर जाती है
ज्योतिपुंज से घबडाती है




Vikash Pandey


Kanpur

Saturday, June 20, 2015

मैं एक चातक जैसा हूँ,

मैं एक चातक जैसा हूँ,
मत पूछो कि मैं कैसा हूँ,
प्यास हूँ सावन भादों में,
जीता हूं सुन्दर यादों में,
चलता रहता हूँ सावन भादों के मौसम पाने को,
कब प्यास बुझाओगे अपनी सुनता रहता हूँ इस ताने को,
मैं एक चातक जैसा हूँ ,
मत पूछो कि मैं कैसा हूँ ,
शिशिर ने ठंडक से तड़पाया,
बसन्त ने पुष्पों से जलवाया,
ग्रीष्म ने अंगारे बरसाये,
तब जाकर सावन भादों आये,

मैं एक चातक जैसा हूँ,
मत पूछो कि मैं कैसा हूँ,
देख मेरे प्यासे होंठों को,
सावन की बूँदें बोल पड़ी,
हे! जोगी बता कैसे प्यास बुझेगी तेरी,
मेरी प्यास वेदना को देख,
स्वाती का ह्रदय पिघल गया,
बोली- हे! सावन की बूँदों,
जब वर्षा होगी मेरी,
Vikash Pandey
Kanpur

Friday, June 19, 2015

वह कुमुदिनी का पुष्प हमें, जग में सबसे प्यारा हैं।

लेकर के सौन्दर्य चन्द्र का
एक पुष्प खिला हैं रातों में,
जिसकी सुगन्ध से महक रहे हैं,
वन, उपवन बरसातों में,




चन्द्र की चंचल किरणों ने,
जिसका सौन्दर्य संवारा हैं,
निशा ने जिस पर,
अपनी अंगड़ाई को वारा हैं,





वह कुमुदिनी का पुष्प हमें,
जग में सबसे प्यारा हैं।
Vikash Pandey
Kanpur

मैं कविता नहीं लिखता, अपने जज्बात लिखता हूँ।

 मैं कविता नहीं लिखता, 
अपने जज्बात लिखता हूँ। 
अपनी खामोशी लिखता हूँ, 
अपने हालात लिखता हूँI 

जो किसी से नहीं कहा, 
वो बात लिखता हूँ। 
काँटे लिखता हूँ, 
फूलों की रात लिखता हूँ। 

मैं कविता नहीं लिखता, 
अपने जज्बात लिखता हूँ। 
अपनी खामोशी लिखता हूँ, 
अपने हालात लिखता हूँI 

कभी अमावस लिखता हूँ। 
कभी चांदनी रात लिखता हूँI 

जानते हैं सभी मुझको , 
पर अपने कुछ ,
अनदेखे रूपों की,
पहचान लिखता हूँ। 

जीत लिखता हूँ, 
कभी मैं हार लिखता हूँ। 
दूरियां लिखता हूँ, 
कभी मिलन की रात लिखता हूँ।

मैं कविता नहीं लिखता, 
अपने जज्बात लिखता हूँ। 
अपनी खामोशी लिखता हूँ, 
अपने हालात लिखता हूँI

Vikash Pandey

Kanpur

हम वो पल है जो हमेशा याद आयेगे,

हम वो पल है जो हमेशा याद आयेगे,

हवा का वो झौका नहीं जो छूकर दूर जायेगे,



कभी आँखे कभी आंसू,

कभी ख़ुशी बनकर मुस्करायेगे,

कभी सावन की बूंदों में,

कभी पतझड़ के पत्तो में,

आकर तुम्हारी बगिया में बिखर जायेगे,




हम वो पल है जो हमेशा याद आयेगे,

हवा का वो झौका नहीं जो छूकर दूर जायेगे,



जीत पर तो सभी खुशिया मनाते है,

हम हार कर भी तुम्हारी जीत की खुशिया मनायेगे,



हम वो पल है जो हमेशा याद आयेगे,

हवा का वो झौका नहीं जो छूकर दूर जायेगे,




यदि भूलकर भी आप किसी फूल को उठायेगे.

हम उसमे ख़ुशबू बनकर महक जायेगे,




हम वो पल है जो हमेशा याद आयेगे,

हवा का वो झौका नहीं जो छूकर दूर जायेगे,


Vikash Pandey

Kanpur