Monday, December 16, 2019

चंद्र- निशा का बंधन ऐसा

चंद्र- निशा का बंधन ऐसा
श्वेत- स्याह का चुंबन जैसा
प्रणय मिलन से शीत है ऐसी
आलिंगन से उष्मा जैसी

डूब गए वो एक दूजे में
जैसे भाव- भक्ति पूजा में
लिये मधुरता मन - भावों में
विषय बन गये वन गावों में

विकास पाण्डेय

Tuesday, November 26, 2019

कविताओं का संग्रह

एक दिन मुझसे कानपुर के प्रतिष्ठित आलोचक श्री श्यामसुंदर निगम जी ने पूछा- विकास, बहुत से रचनाकारों के काव्य संग्रह आ चुके है, तुम्हारी कविताओं का संग्रह कब प्रकाशित होगा?
मैंने कहा- बाबूजी, मैं चाहता हूं कि मेरी कविताओं का संग्रह मेरी परिपक्वता को प्रदर्शित करे न कि मेरी अपरिपक्वता एवं अज्ञानता को। अतः अभी दो से ढाई वर्ष का समय लग जायेगा।

Saturday, November 16, 2019

पृथ्वी- चंद्र

पृथ्वी- चंद्र दूर है कितने
रहे न दूर निकट है इतने
आलिंगन में है वह दोनों
मिले न प्रिय विवश है कितने


विकास पाण्डेय

तुलसी-शालिग्राम विवाह

तुलसी-शालिग्राम विवाह


रानी थी असुर जलंधर की
देवि वृंदा था नाम उनका
वो नारी भी थी पतिव्रता
जग में बड़ा था मान उनका।

जब देवासुर संग्राम हुआ
चला जलंधर भी लड़ने को
मान बढ़ाने को असुरों का
वो सुर कुल से भी भिडने को।


जब देव सभी भयभीत हुए
सब के मन आया एक नाम
तब मिल कर वो चल दिये सभी
पहुँच गये श्री हरि के धाम।

श्री हरि भी थे असमंजस में
उनको कैसे देव हराये
आज चिंतन में लग गए वो
कैसे दानव स्वर्ग न पाए?


मार्ग मिला उनको न कोई
लें रूप जलंधर वो आये
जब वृन्दा उनसे निकट हुयी
विपरीत मेघ पति पर छाये

घिर गया जलंघर संकट से
वृन्दा का तपबल नष्ट हुआ
जब देखा शीश जलंधर का
उसके अंतस में कष्ट हुआ

श्री हरि पत्थर बन वास करो
देवी वृंदा ने श्राप दिया
अपने सतीत्व के तप बल से
अपना जीवन भी नष्ट किया


वृंदा के आत्म त्याग स्थल पर
तुलसी का पौधा उग आया
हरि पत्थर शालिग्राम हुये
जग ने उनका ब्याह रचाया



कार्तिक, शुक्ल, एकादशी (विक्रम संवत 2076) तुलसी- शालिग्राम विवाह के अवसर पर की गई मेरी रचना!



विकास पाण्डेय


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Sunday, November 3, 2019

चंद्र निशा का बंधन ऐसा

चंद्र निशा का बंधन ऐसा
श्वेत स्याह का चुंबन जैसा
डूब गए वो एक दूजे में
जैसे भाव भक्ति पूजा में


विकास पाण्डेय

Friday, October 25, 2019

लेकर सोलह चंद्र कलाएं

लेकर सोलह चंद्र कलाएं
तन मन में वह प्रीत जगाए
प्रियतम है वह सारे जग का
संग निशा वो रास रचाएं



तमी शरद की निशा वरद की
जगत में वह कर्षण बिखराये
मधु की वर्षा आज धरा पर
चंद्र की किरणों के संग आए


चन्द्र के चंचल बन्धन से
निशा सुगन्धित है मधुबन से
निशा हुयी है दिव्य धरा पर
प्रिय के मधुर आलिंगन से



चंद्र माधुरी की उमंग में
टूट गई है सब सीमाएं
झूम रहे हैं मन, वन उपवन
चंद्र लिये है पूर्ण कलायें




विकास पाण्डेय

Friday, August 2, 2019

हम वो पल है जो हमेशा याद आयेगे

हम वो पल है जो हमेशा याद आयेगे, 
हवा का झौंका नहीं कि छू दूर जायेगे।


सावन की बूंदों में, पतझड़ के पत्तो में
कभी बगिया में तेरी आ बिखर जायेगे।
कभी आंसू, कभी ख़ुशी बन मुस्करायेगे,
तेरे अधरों पर गीत बन गुनगुनाएंगे।

हम वो पल है जो हमेशा याद आयेगे,
हवा का झौंका नहीं कि छू दूर जायेगे।


भूलकर तुम जब किसी पुष्य को उठाओगे
हम उसी मे ख़ुशबू बनकर महक जायेगे।


हम वो पल है जो हमेशा याद आयेगे,
हवा का झौंका नहीं कि छू दूर जायेगे।



यहां जीत पर तो सभी खुशिया मनाते है,
यशोगान करते हैं और गीत गाते हैं।
हम अपनी हार पर भी तो मुस्कुराएंगे
मगर तुम्हारी जीत की खुशियां मनाएंगे।


हम वो पल है जो हमेशा याद आयेगे,
हवा का झौंका नहीं कि छू दूर जायेगे।


-विकास पाण्डेय

Monday, July 29, 2019

मेरा साहित्यिक जीवन

मेरे साहित्यिक जीवन का प्रारम्भ वर्ष 2003- 04 के लगभग हुआ था जब मैं पहली बार जिला बार एसोसिएशन, इलाहाबाद के द्वारा आयोजित कवि सम्मेलन को सुनने गया था जिसमें मुझे यश शेष कैलाश गौतम जी एवं श्री कमलेश द्विवेदी जैसे श्रेष्ठ कवियों को सुनने का अवसर प्राप्त हुआ था।



 इसके बाद मेरी रुचि साहित्यिक कार्यक्रमों में बढती गयी और साहित्यिक कार्यक्रम टी. वी. पर देखने लगा।

वर्ष 2005- 06 के लगभग मैंनें अपनी पहली कविता लिखी थी। वर्ष 2006 में विधि स्नातक करते समय मैंनें कई कवितायें लिखी और इसी समय मेरे जीवन का पहला मंच मुझे प्राप्त हुआ जिसमें मेरे साथ आदरणीय कविगण के रुप में श्री यश मालवीय जी, श्री श्लेश गौतम जी एवं श्री शैलेन्द्र श्रीवास्तव "मधुर" जी थे और एक टी. वी. कार्यक्रम में भी मुझे कविता सुनाने का अवसर प्राप्त हुआ। इन सभी कार्यक्रमों तक मुझे ले जाने वाले आधार स्तम्भ श्री शैलेन्द्र श्रीवास्तव "मधुर" जी थे।

मेरा जीवन

माघ मास, नवमी, कृष्ण पक्ष का साथ मिला
दो हजार पैंतीस विक्रम संवत का हुआ राज।
जब विचरण करती स्वाति आयी नक्षत्रलोक
चातक जातक बनकर निरखी हुआ विराज।।

सिकन्दर भी जहा रोया, मैं वो भारत की माटी हूँ,

सिकन्दर भी जहा रोया, मैं वो भारत की माटी हूँ,
जहा विचलित हुआ ग़ोरी, मैं वो वीरो की घाटी हूँ,
चटा दे धूल दुश्मन को, मैं वो भारत की थाती हूँ,
लिखा है प्रेम तलवारों पर, मैं वो वीरो की पाती हूँ,

-विकास पाण्डेय

Friday, July 26, 2019

मैं एक चातक जैसा हूं

मैं एक चातक जैसा हूं
मत पूछो कि मैं कैसा हूं
सावन भादों जमकर बरसे
पर पानी को चातक तरसे





स्वाति की बूंदों के कर्षण में
जंगल उपवन में वो भटके
मेघों की बरसात में जैसे
खाली पड़े घाट घट मटके





प्यासा जीवन प्यासा तन मन
घूमें लेकर वन उपवन
प्यू कहां प्यू कहां शोर मचाए
पानी मगर कहीं ना पाए






चातक की चाह को मेघों ने
स्वाति से आज विनय की है
जैसे प्रेम पथिक को प्रिय से
अपनी आस प्रणय की है।




विकास पाण्डेय

वो मेरी जिंदगी में आने को बेकरार है,

वो मेरी जिंदगी में आने को बेकरार है,
इसे कहूं दिवाली या रंगों का त्योहार है।
मेरी अदा पसंद है इस कदर उनको,
दिन को भी रात कहने को तैयार है।


गर हो उनकी अदालत में मुकदमा मेरा,
मेरी झूठी दलीलें भी उन्हें स्वीकार हैं।
क्या इसको कह दूं मैं उनका समर्पण,
या मुझमें बसा उनका कोई संसार हैै।





विकास पाण्डेय