तुलसी-शालिग्राम विवाह
रानी थी असुर जलंधर की
देवि वृंदा था नाम उनका
वो नारी भी थी पतिव्रता
जग में बड़ा था मान उनका।
जब देवासुर संग्राम हुआ
चला जलंधर भी लड़ने को
मान बढ़ाने को असुरों का
वो सुर कुल से भी भिडने को।
जब देव सभी भयभीत हुए
सब के मन आया एक नाम
तब मिल कर वो चल दिये सभी
पहुँच गये श्री हरि के धाम।
श्री हरि भी थे असमंजस में
उनको कैसे देव हराये
आज चिंतन में लग गए वो
कैसे दानव स्वर्ग न पाए?
मार्ग मिला उनको न कोई
लें रूप जलंधर वो आये
जब वृन्दा उनसे निकट हुयी
विपरीत मेघ पति पर छाये
घिर गया जलंघर संकट से
वृन्दा का तपबल नष्ट हुआ
जब देखा शीश जलंधर का
उसके अंतस में कष्ट हुआ
श्री हरि पत्थर बन वास करो
देवी वृंदा ने श्राप दिया
अपने सतीत्व के तप बल से
अपना जीवन भी नष्ट किया
वृंदा के आत्म त्याग स्थल पर
तुलसी का पौधा उग आया
हरि पत्थर शालिग्राम हुये
जग ने उनका ब्याह रचाया
कार्तिक, शुक्ल, एकादशी (विक्रम संवत 2076) तुलसी- शालिग्राम विवाह के अवसर पर की गई मेरी रचना!
विकास पाण्डेय
https://vp09.blogspot.com
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