Thursday, June 22, 2017

मुक्तक

मेरे चेहरे की चमक देखकर मुझसे दूर जाने लगे हैं।
कभी पास आने की जिद थी अब कतराने लगे हैं॥


अन्ना को चाहिये लोकपाल।
मुझको चाहिये ठोंकपाल।।



परीक्षा थी मेरे हौसले के परों की।
चाहत थी मुझे चांद पर घरों की।।



फागुन की नरमी हैं
होली की गरमी हैं
हाथों में रंग-गुलाल
बस थोडी बेशरमी हैं




मेरे गीतों में वो छाने लगे है,
मेरे सपनों में दुनियाँ बसाने लगे है।
कल तक जिन्हें चाहत थी दूर जाने की,
अब हमें सपनों में अपने बसाने लगे है॥




कलियों से खुशबू आयी हैं
तन मन में उमंग छायी हैं

मदहोश है वो

मदहोश है वो उन्हें मेरी खबर नही है
सोचते है कि डूब जायेगी मेरी नाव
पर मेरी राह में कोई भंवर नही है

अहं के शिखर पर बैठने वालो
जरा झुक के देखो
तुम्हारे लिये उतरने की
कोई डगर नही है

साजिशें रचना तो
फितरत तुम्हारी है
तुम्हारी हरकतों से मैं
बेखबर भी नही हूँ

तुम्हे अच्छी लगती है
रबड़ की मुहरें
मैं रबड़ से बनी
मुहर भी नही हूँ

मेरा नाम मेरी पहचान है
मेरा नाम अपनों की शान है,
मेरे नाम में बसती है एक दुनिया
मेरा नाम मेरे अपनों की जान है,
जीते है कुछ चेहरे मेरे लिये
मेरे नाम के बिना
उनकी दुनिया सुनसान है,

विकास पान्डेय