Tuesday, November 26, 2019

कविताओं का संग्रह

एक दिन मुझसे कानपुर के प्रतिष्ठित आलोचक श्री श्यामसुंदर निगम जी ने पूछा- विकास, बहुत से रचनाकारों के काव्य संग्रह आ चुके है, तुम्हारी कविताओं का संग्रह कब प्रकाशित होगा?
मैंने कहा- बाबूजी, मैं चाहता हूं कि मेरी कविताओं का संग्रह मेरी परिपक्वता को प्रदर्शित करे न कि मेरी अपरिपक्वता एवं अज्ञानता को। अतः अभी दो से ढाई वर्ष का समय लग जायेगा।

Saturday, November 16, 2019

पृथ्वी- चंद्र

पृथ्वी- चंद्र दूर है कितने
रहे न दूर निकट है इतने
आलिंगन में है वह दोनों
मिले न प्रिय विवश है कितने


विकास पाण्डेय

तुलसी-शालिग्राम विवाह

तुलसी-शालिग्राम विवाह


रानी थी असुर जलंधर की
देवि वृंदा था नाम उनका
वो नारी भी थी पतिव्रता
जग में बड़ा था मान उनका।

जब देवासुर संग्राम हुआ
चला जलंधर भी लड़ने को
मान बढ़ाने को असुरों का
वो सुर कुल से भी भिडने को।


जब देव सभी भयभीत हुए
सब के मन आया एक नाम
तब मिल कर वो चल दिये सभी
पहुँच गये श्री हरि के धाम।

श्री हरि भी थे असमंजस में
उनको कैसे देव हराये
आज चिंतन में लग गए वो
कैसे दानव स्वर्ग न पाए?


मार्ग मिला उनको न कोई
लें रूप जलंधर वो आये
जब वृन्दा उनसे निकट हुयी
विपरीत मेघ पति पर छाये

घिर गया जलंघर संकट से
वृन्दा का तपबल नष्ट हुआ
जब देखा शीश जलंधर का
उसके अंतस में कष्ट हुआ

श्री हरि पत्थर बन वास करो
देवी वृंदा ने श्राप दिया
अपने सतीत्व के तप बल से
अपना जीवन भी नष्ट किया


वृंदा के आत्म त्याग स्थल पर
तुलसी का पौधा उग आया
हरि पत्थर शालिग्राम हुये
जग ने उनका ब्याह रचाया



कार्तिक, शुक्ल, एकादशी (विक्रम संवत 2076) तुलसी- शालिग्राम विवाह के अवसर पर की गई मेरी रचना!



विकास पाण्डेय


https://vp09.blogspot.com

Sunday, November 3, 2019

चंद्र निशा का बंधन ऐसा

चंद्र निशा का बंधन ऐसा
श्वेत स्याह का चुंबन जैसा
डूब गए वो एक दूजे में
जैसे भाव भक्ति पूजा में


विकास पाण्डेय