Tuesday, December 20, 2016

जन मानस को मोह रहे हो


 पूर्व प्रधानमंत्री भारत रत्न श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी को उन्के जन्मदिन 25 दिसम्बर की हार्दिक शुभकामनायें।

उनके जन्मदिन के अवसर पर मैं अपनी इस कविता के माध्यम से उन्हे शुभकामनायें एवं सम्मान देना चाहूँगा।







जन मानस को मोह रहे हो
छिपकर सबको टोह रहे हो

कहते-कहते रूक जाना
रूकते-रूकते कह जाना
 चाह नही थी
जिसको
कुछ पाने की
चाह नही थी
जिसको
अभिनन्दन की

चाह नही थी
जिसको
पुष्पहार की
चाह नही थी
जिसको
चन्दन की

चाह नही थी
कुछ पाने की
व्यक्तित्व था
ऐसा मनमाना


निकले थे तुम
जिस पथ से
वह पथ अब तक
कुछ सोच रहा है,
निकला था
एक पथिक
मार्ग से
अब तक
उसको खोज
रहा है,
आयेगा फिर
पथिक हमारा
मार्ग अभी तक
सोच रहा है,


शब्द तुम्हारे
बन मधुशाला
जग को
मोह रहे है
अब तक
बना रहेगा
नाम तुम्हारा
नभ में
सूर्य चन्र्द है
जब तक


ध्रुव तारा भी
सोचता होगा
क्या होगा
कोई मुझसा
जग में
देख तुम्हारी
चमक धरा पर
चकित हो गया
होगा नभ में

कर्तव्य मार्ग पर
रूके नही
बाधाओं से
झुके नही
हटे नही
बाधाओं से
तुम कैसे
रसिया निकले
बच निकले
राधाओं से

 किया समर्पित
तुमनें सब कुछ
राष्ट्रवाद के
यज्ञ कुंड में
राष्ट्रवाद के
अश्वमेघ को

विजय पताका
फहरा दी
कारगिल की उॅंची
चोटी-चोटी पर
अटल पताका
फहरा दी
कारगिल की उॅंची
चोटी-चोटी पर
जय घोष
लिखा तुमने
कारगिल की उॅंची
चोटी-चोटी पर

रोक नही
पायी बाधायें
राष्ट्रवाद के
बढते रथ को
मानवता की
अटल राह में

राष्ट्रवाद के
सन्यासी को
कर रहे नमन
अन्तर्मन से
भाव हमारे
शब्द बन गये
तुम पर लिखने की
अटल चाह में

 किया उद् घोष
मित्रता का
उस पर जब
प्रहार हुआ
शंखनाद किया तुमने
दुष्टों का संहार हुआ
गरजी तोंपें
जब भारत की
दुश्मन का
संहार हुआ


Sunday, April 24, 2016

भाग्य का लेखा लिखने वाले तेरे खेल निराले है

भाग्य का लेखा लिखने वाले
तेरे खेल निराले है
कही-कही पर धूप खिली है
कही प्रकाश के लाले है
कही-कही पर शब्दों की गंगा
कही जुबां पर ताले है



भाग्य का लेखा लिखने वाले
तेरे खेल निराले है





कही-कही पर महलों की रंगरलियां
कही मुश्किल हुये निवाले है
कही-कही पर खिलता यौवन
कही बचपन कुंठा के हवाले है



भाग्य का लेखा लिखने वाले
तेरे खेल निराले है


भाई बहन सब द्दूट गये
साली पर मरने वाले है
माँ बाप हुये वृद्धाश्रम के
घर के स्वामी साले है

भाग्य का लेखा लिखने वाले
तेरे खेल निराले है 

Saturday, March 26, 2016

वो मेघ तो थे नही

वो मेघ तो थे नही
जो दूत बन जाते

वो तो पंक्षी थे
क्यों न पंख फडफड़ाते
वो प्रकाश के
थे आदी
क्यों चन्द्र बनकर
अन्धेरे से दोस्ती
निभाते

चले जब हम
फूलों की डगर पर
साथ थे वो
साये की तरह
काँटों की डगर पर भी
क्यों अपना वो हक
जताते

Thursday, March 24, 2016

मफलर वाले सीoएम० साहब

मफलर वाले सीoएम० साहब
नित नये बदलते रंग।
उनकी अदा को देखकर
गिरगिट भइयाँ दंग।।
दीवाने भईयाँ तुम्ही बताओं
लाये कौन सा रंग।
बस्सी को भी रंग  लगाओं
खतम करो जंग से जंग।।

Wednesday, March 9, 2016

देशद्रोह की परिभाषा को शब्दों से क्यों मोड़ रहे हो

जिस देश में तुमने जनम लिया
उस देश को तुम क्यों तोड़ रहे हो
देशद्रोह की परिभाषा को
शब्दों से क्यों मोड़ रहे हो




भारत की जिस शान के लिये
गाँव का बालक
सीमा पर प्राण गवाँता है
भारत के उस गौरव को
विद्वानों के गढ़ में
कुचला जाता है





गाँव के मास्टर साहब की
सारी शिक्षा भूल गये
राजनीति की हवाओं से
गुब्बारे जैसा फूल गये





राम कृष्ण की धरती पर
महिषासुर बन इठलाते हो
ममतामयी माँ दुर्गा पर
क्या- क्या आक्षेप लगाते हो