Friday, February 12, 2021

मैं घाट बनारस का सा, गंगा सी आओ तुम

मैं घाट बनारस का सा, गंगा सी आओ तुम,
मैं गोकुल की रज जैसा, यमुना सी आओ तुम,
मैं प्रीत चन्द्रमा की, तुम बनके निशा आना,
मैं संगम के तट सा, प्रिय मिलने आ जाओ तुम,


विकास पाण्डेय 

Monday, February 1, 2021

नियति सभी की लिखने वाले

नियति सभी की लिखने वाले
ये तेरे खेल निराले है
कही धरा पर धूप खिली है
कही प्रकाश के लाले है


कही-कही शब्दों की गंगा
कही वाणी लगे ताले है
कभी चन्द्रमा संग निशा
कभी रजनी मेघ काले है


कही बिछी पुष्पों की शैय्या
कही पर पाँव के छाले है
कही भूख प्यास लिये जीवन
कही मदिरा भरे प्याले है


कही पर महल के राज भोग
हुये कही कठिन निवाले है
कहीं उत्सव और रंग उडे
कुंठा के कही दुशाले है


दूर हुये है भाई बहनों से
साली पर मरने वाले है
माँ बाप गये वृद्धाश्रम को
अब घर के स्वामी साले है


विकास पाण्डेय

Saturday, January 30, 2021

विषधरो को दूध अब पिलाता नहीं,

विषधरो को दूध अब पिलाता नहीं,
अब नागों को अपना बताता नहीं,
अपना बनके रहे जो आस्तीन में,
अब दामन में उनको छुपाता नहीं,

व्यर्थ का शोर अब मैं मचाता नहीं,
लक्ष्य अपना किसी को बताता नहीं,
कल तक कहता था मैं, सुधर जाइए,
अब नागों को दर्पण दिखाता नहीं,

विकास पाण्डेय