विषधरो को दूध अब पिलाता नहीं,
अब नागों को अपना बताता नहीं,
अपना बनके रहे जो आस्तीन में,
अब दामन में उनको छुपाता नहीं,
व्यर्थ का शोर अब मैं मचाता नहीं,
लक्ष्य अपना किसी को बताता नहीं,
कल तक कहता था मैं, सुधर जाइए,
अब नागों को दर्पण दिखाता नहीं,
विकास पाण्डेय
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