ये तेरे खेल निराले है
कही धरा पर धूप खिली है
कही प्रकाश के लाले है
कही-कही शब्दों की गंगा
कही वाणी लगे ताले है
कभी चन्द्रमा संग निशा
कभी रजनी मेघ काले है
कही बिछी पुष्पों की शैय्या
कही पर पाँव के छाले है
कही भूख प्यास लिये जीवन
कही मदिरा भरे प्याले है
कही पर महल के राज भोग
हुये कही कठिन निवाले है
कहीं उत्सव और रंग उडे
कुंठा के कही दुशाले है
दूर हुये है भाई बहनों से
साली पर मरने वाले है
माँ बाप गये वृद्धाश्रम को
अब घर के स्वामी साले है
विकास पाण्डेय
कुंठा के कही दुशाले है
दूर हुये है भाई बहनों से
साली पर मरने वाले है
माँ बाप गये वृद्धाश्रम को
अब घर के स्वामी साले है
विकास पाण्डेय
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