Thursday, December 31, 2015

जब अपनी बातें होंगी जब अपनी मुलाकातें होंगी

जब अपनी बातें होंगी
जब अपनी मुलाकातें होंगी



कुछ खट्टे मीठे पल होंगे
कुछ प्यार भरी सौगातें होंगी
कुछ तेरे दिन होंगे
कुछ मेरी रातें होंगी



जब अपनी बातें होंगी
जब अपनी मुलाकातें होंगी



जब अपनी बातें होंगी
जब अपनी मुलाकातें होंगी



यादों की तुम चादर ओढ़े
जब मेरे सामने आना
मेरी कुछ सुन लेना
अपनी भी कहते जाना



जब अपनी बातें होंगी
जब अपनी मुलाकातें होंगी



मेरे मन के फव्वारे से
जल की बूँदें निकल रही हैं
बादल हो जो मन में तुम्हारे
उनको तुम बरसा जाना



जब अपनी बातें होंगी
जब अपनी मुलाकातें होंगी



विकास पाण्डेय


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अब मैं नागों को दूध पिलाता नहीं हूँ

अब मैं नागों को
दूध पिलाता नहीं हूँ
व्यर्थ का शोर
मचाता नहीं हूँ
कदम बढ़ाता हूँ
लक्ष्य की ओर
लक्ष्य का शोर
मचाता नहीं हूँ

अब मैं नागों को
दूध पिलाता नहीं हूँ



नागों को आईना
दिखाता नहीं हूँ
कल तक थे
जो मेरे निकट
अब मैं उनको अपना
बताता नहीं हूँ

अब मैं नागों को
दूध पिलाता नहीं हूँ



कल तक थे
वो मेरे निकट
अब मैं उनको
अपनी आस्तीन
छिपाता नहीं हूँ

अब मैं नागों को
दूध पिलाता नहीं हूँ





विकास पाण्डेय





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Tuesday, December 29, 2015

आप के अन्दाज से आम आदमी चकरा गया 


आप के अन्दाज से
आम आदमी चकरा गया
आप को देखा तो
दिल्ली को पसीना आ गया






आम आदमी खुश हुआ
आम आदमी आ गया
देख करके खिलाड़ी
आम आदमी चकरा गया
कल तक था जो
त्याग कि मूर्ति बना हुआ
आज वह चारा घोटाला
वालों के निकट आ गया







 रात के अन्धेरे में
देखकर जुगनूँ की चमक
आम आदमी ने
दीयें सभी बुझा दिये
आम आदमी के
जीवन में अन्धेरा छा गया
आप के अन्दाज से
आम आदमी चकरा गया






कल तक थे जो निर्भया के लिये
मोमबत्ती थामें हुयें
आज उन्हें एक बलत्कारी को
सिलाई  मशीन देना भा गया
आप के अन्दाज से
आम आदमी चकरा गया






कल तक कहता था जो
आधे वेतन से इतिहास बनाऊँगा
वो ईमानदारी के नाम पर
अपना वेतन-भत्ता बढा गया
आप के अन्दाज से
आम आदमी चकरा गया



 जो स्वयं भटके हुये है
वो मार्ग क्या बतलायेंगे
स्वयं कहा जायेंगे
दूसरों को कहाँ पहुँचायेंगे




आप के वादे अभी
सच हुये साबित नहीं
रुक कर थोड़ा देख लूँ
आप क्या-क्या दिन दिखलायेंगे




 कुछ नये आरोपों की
क्या कोई गठरी लायेंगे
या पुराने आरोपों से
आप काम चलायेंगे





आप की यह अदा भी
हमको तो अच्छी लगी
करना हमको कुछ भी नही
बस अरोपों से काम चलायेंगे







आप के अन्दाज से
आम आदमी चकरा गया
आप को देखा तो
दिल्ली को पसीना आ गया



विकास पाण्डेय


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Thursday, December 24, 2015

बन गये रत्न भारत के तुम ज्योतिपुंज आरती के तुम

पूर्व प्रधानमंत्री भारत रत्न श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी को उन्के जन्मदिन 25 दिसम्बर की हार्दिक शुभकामनायें।

उनके जन्मदिन के अवसर पर मैं अपनी इस छोटी सी कविता के माध्यम से उन्हे शुभकामनायें एवं सम्मान देना चाहूँगा।

बन गये रत्न भारत के तुम
ज्योतिपुंज आरती के तुम

तुम्हारे विचारों की कोमल लताये
हैं सर्वत्र लटक रही
अपने प्याारे अटल के लिये
मानवता है तडप रही

क्यों अपनों से
तुमने मुँह मोड लिया
अपने सपनों की नौका को
क्यों मझधार में छोड दिया

राजनीति के गलियारों को
तुमने ऐसे छोड दिया
जैसे प्राणों ने जीवन से
अपना नाता तोड लिया

बन तपस्वी, बन वनवासी
एकान्तवास के अभिलाषी

मानवता के देवदूत
भारत माँ के सपूत

अटल नाम का सूरज न हो
वह सुबह नही होने देंगे
लाखों आँधी तूफान आये
तुम्हारे आभा मण्डल की
चमक नही खोने देंगे

आने वाले युगों-युगों तक
तुम्हें पुकारा जायेगा
भारत भूमि का कण-कण
अटल-अटल दुहरायेगा

विकास पाण्डेय

Sunday, December 20, 2015

गंगा

मोक्षदायिनी गंगा है,
वर प्रदायिनी गंगा है,
सींचे है लाखों प्राणों को,
जीवन प्रदायिनी गंगा है,

 गंगा का वैभव
सुनाऊँ मैं कैसे
सूर्य के समक्ष
दीपक हूँ जैसे

जनपद काल से
अब तक
गंगा की निर्मल धारा ने

जनपद काल का
वैभव देखा
मुगलों का भी
उद्‌भव देखा
देखी हैं
अंग्रेजों की सत्ता
देखा है
गाँधी का प्रण
देखे हैं
आन्दोलन के क्षण

 सन सत्तावान से
सैतालीस तक
अपने प्यारे लालों का
बहता हुआ
रक्त भी देखा

मोक्षदायिनी गंगा है,
वर प्रदायिनी गंगा है,
सींचे है लाखों प्राणों को,
जीवन प्रदायिनी गंगा है,



 हरिद्वार में
अलख जगायी है
कानपुर की
प्यास बुझायी है
बन्दी माता के मन्दिर का
अद्भुत सौन्दर्य बढ़ाया है
बिठूर के पावन तट ने भी
तेरा वैभव गया है


हे! गंगा तुमने
अनासक्त भाव से
सबको ह्रदय लगाया है
असनी का
मान बढ़ाया है
कौशाम्बी ने
वैभव पाया है
प्रयाग के मस्तक पर
तिलक लगाया है
वाराणसी को
अध्यात्म गुरू का
मान दिलाया है
पटना से बंगाल तक
लाखों का जीवन हर्षाया है



भारत के जन-जन ने
माँ तुझको शीश झुकाया है
सबका मन हर्षाया है
आशा के दीप जलाया है