Tuesday, December 29, 2015

आप के अन्दाज से आम आदमी चकरा गया 


आप के अन्दाज से
आम आदमी चकरा गया
आप को देखा तो
दिल्ली को पसीना आ गया






आम आदमी खुश हुआ
आम आदमी आ गया
देख करके खिलाड़ी
आम आदमी चकरा गया
कल तक था जो
त्याग कि मूर्ति बना हुआ
आज वह चारा घोटाला
वालों के निकट आ गया







 रात के अन्धेरे में
देखकर जुगनूँ की चमक
आम आदमी ने
दीयें सभी बुझा दिये
आम आदमी के
जीवन में अन्धेरा छा गया
आप के अन्दाज से
आम आदमी चकरा गया






कल तक थे जो निर्भया के लिये
मोमबत्ती थामें हुयें
आज उन्हें एक बलत्कारी को
सिलाई  मशीन देना भा गया
आप के अन्दाज से
आम आदमी चकरा गया






कल तक कहता था जो
आधे वेतन से इतिहास बनाऊँगा
वो ईमानदारी के नाम पर
अपना वेतन-भत्ता बढा गया
आप के अन्दाज से
आम आदमी चकरा गया



 जो स्वयं भटके हुये है
वो मार्ग क्या बतलायेंगे
स्वयं कहा जायेंगे
दूसरों को कहाँ पहुँचायेंगे




आप के वादे अभी
सच हुये साबित नहीं
रुक कर थोड़ा देख लूँ
आप क्या-क्या दिन दिखलायेंगे




 कुछ नये आरोपों की
क्या कोई गठरी लायेंगे
या पुराने आरोपों से
आप काम चलायेंगे





आप की यह अदा भी
हमको तो अच्छी लगी
करना हमको कुछ भी नही
बस अरोपों से काम चलायेंगे







आप के अन्दाज से
आम आदमी चकरा गया
आप को देखा तो
दिल्ली को पसीना आ गया



विकास पाण्डेय


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