Saturday, July 14, 2018

मन्द शीतल सुगन्धित पवन आज है

मन्द शीतल सुगन्धित पवन आज है।
दिल में तेरे छिपे कुछ मेरे राज है।।
लाख जतनों के बाद भी जहां सुन न पाया।
आ रही तेरे दिल की वो आवाज हैं।
तेरी आँखों में हैं कुछ राज गहरे।
तेरी हसरतों पर हैं जमाने के पहरे॥
मेरे शब्दों को छोड़ो
मेरी खामोशियां भी लोगों को
अपना बना लेती है।

पूँस की ठंडी- ठंडी रातें

पूँस की ठंडी- ठंडी रातें
बस रजाई कम्बल की बातें
ब्लोअर से कुछ राहत पायी
सड़क पर निकले आफत आयी
शिमला बन गया शहर हमारा
ठंड, कोहरे का खेल है सारा

जमाने वालो तुम्हे बहुत नाज है अपने खंजर पर

जमाने वालो तुम्हे बहुत नाज है अपने खंजर पर
किन्तु हम भी अपनी म्यान में तलवार रखते है
बन्द कर दो दीवान -ए- खास में साजिशें रचना
आओ चलो दीवान-ए- आम में जंग का ऐलान करते है

मेरे सपनों के रंग बसंती थे

मेरे सपनों के रंग बसंती थे
जैसे गुलाब लाजवंती थे

मेरे सपनों की छटा निराली थी
मेरे सपनों में रस की प्याली की

मेरे सपनों में तरुणाई थी
मेरे सपनों में निशा शरमाई थी

मेरे सपनों में कलियां खिलती थी
मेरे सपनों में उपवन हंसते थे
कोयल गीत सुनाती थी
मैना प्रीत बताती थी

मेरे सपनों में पायल की छन-छन
मेरे सपनों में चूड़ी की खन-खन

मेरे सपनों में केशो के बादल
मेरे सपनों में नैन नशीले थे
मेरे सपनों में सावन की बूँदें
मेरे सपनों में दुपट्टे गीले थे

समय की ऐसी आंधी आयी
सारे सपने टूट गये
कलियां, कोयल, मैना, उपवन
सारे मुझसे छूट गाये

मेरे सपनों में ऐसे मंजर है
जिनमें तलवारें खंजर है

मेरे सपनों में बजे नगाड़े हैं
मेरे सपनों में सिंह दहाड़े हैं
मेरे सपनों घोड़ो की टापें
गजराजों की चिघाड़े हैं

मेरे सपनों में हल्दी घाटी है
मेरे सपनों में शौर्य मराठी है
मेरे सपनों में राणा का तप है
मेरे सपनों में बाजीराव का बल है

विकास पाण्डेय


बसा डाले जहां भर में हजारों दिल के नगर मैंने

बसा डाले जहां भर में हजारों दिल के नगर मैंने
ख्वाहिश रह गयी तेरे दिल में कुटिया बनाने की,
चाहत का जो मसला था बुहुत सीधा- बहुत सादा,
उलझकर रह गया जंग में जैसे तलवारें जमाने की,


विकास पाण्डेय
मेरी हदें हैं कि सागर की वो लहरें
जिनका कोई किनारा नहीं हैं॥
विकास पाण्डेय

रोज-रोज तुमसे मिलने आऊं, ऐसा मेरा कोई इरादा नहीं।

रोज-रोज तुमसे मिलने आऊं
ऐसा मेरा कोई इरादा नहीं।
पूरी कर दूँ तुम्हारी हर ख्वाहिश
ऐसा मेरा कोई वादा नही।

मेरा दिल फंस जाये जाल में
इतना सीधा-सादा नहीं।
मेरा दिल बाढ़शाह हैं बाढ़शाह
शतरंज का प्यादा नहीं।

मेरी कलम से लिख जाये किसी
सूरज के उगने की कहानी।
मेरी जागती हुँयी इन आँखों में
सपनें भी इतना ज्यादा नही।।

विकास पाण्डेय