Tuesday, November 28, 2023

बहुत जल चुका देश मेरा, अब और नहीं जलने दूँगा,

बहुत जल चुका देश मेरा, अब और नहीं जलने दूँगा,
प्रेम दीप जले न जले, द्वेष की ज्वाला न जलने दूँगा,
देश मेरा स्वर्ग बने न बने, नर्क नहीं बनने दूँगा,
राम का राज बसे न बसे, गढ लंकेश न बसने दूँगा,





विकास पाण्डेय



(सर्वाधिकार सुरक्षित)

Tuesday, November 21, 2023

बहुत जल चुका देश मेरा, अब और नहीं जलने दूॅगा,

बहुत जल चुका देश मेरा, अब और नहीं जलने दूॅगा,

प्रेम दीप जले न जले, द्वेष की ज्वाला न जलने दूॅगा,

देश मेरा स्वर्ग बने न बने, नर्क नहीं बनने दूॅगा,

राम का राज बसे न बसे, गढ लंकेश न बसने दूॅगा,




विकास पाण्डेय

Tuesday, February 21, 2023

महकेगा स्मृतियों का वन जब अपनी मुलाकातें होंगी,

महकेगा स्मृतियों का वन जब अपनी मुलाकातें होंगी,
कुछ खट्टे मीठे पल होंगे, प्यार भरी सौगातें होंगी,
जब भी अपनी बातें होंगी बीते कल से महकेंगे पल,
दूर धरा का तम होगा जब चंद्र निशा की बातें होंगी,

स्मृतियों की चुनरी ओढ़ जब भी तुम मेरे सामने आना,
अपने मन की कह लेना कुछ मेरे मन की सुनते जाना,
मेरे मन के फव्वारे से जल की बूंदें निकल रही हैं,
बादल हो जो हृदय तुम्हारे उनको तुम बरसा जाना,

विकास पाण्डेय "जलज"

Sunday, February 19, 2023

मुक्तक- द्वारिकाधीश विराजें मन्दिर, घर- घर बैठा ग्वाला है,

द्वारिकाधीश विराजें मन्दिर, घर- घर बैठा ग्वाला है,
उलझा हुआ जीवन पथ पर, जो चक्र सुदर्शन वाला है,
सजे हुए रथ को ले करके कुरुक्षेत्र में उलझे अपने,
जिसके जीवन में आनन्द, वो ब्रज का नन्दलाला है,

विकास पाण्डेय "जलज"

Sunday, August 28, 2022

मुक्तक- द्वारे ईडी सीबीआई

द्वारे ईडी सीबीआई,
चीख निकल तेरी क्यों आई,
कर्म किए ऐसे क्या तुमने,
जनता से क्या बात छुपाई,


विकास कुमार पाण्डेय "जलज"
नौबस्ता कानपुर

मुक्तक- बूढ़ी आंखें ताक रही है

बूढ़ी आंखें ताक रही है,
बालकनी से झांक रही है
स्वप्न सजो करके अपनों के
धूल सड़क की फांक रही है

विकास कुमार पाण्डेय "जलज"
 नौबस्ता कानपुर

Thursday, August 11, 2022

मुक्त धरा है, मुक्त गगन है

मुक्त धरा है, मुक्त गगन है
मुक्त है अपना दाना पानी
अंत हुआ गोरों का शासन
बन्द हुआ है कालापानी



नहीं रहा अब मनमानापन
भाग गये हैं अभिमानी
खुलकर उडते आज परिन्दें
टूट गये है जाल ब्रितानी 

किया जिन्होंने जीवन अर्पित
उनको हैं ये शब्द समर्पित

.
सीमा पर जो पड़े हुये हैं
प्रहरी बनकर खडे हुये हैं
शत्रु नही आने पायेगा
बन हिमालय अडे हुये है


राष्ट्रध्वज के नाम पर
जो खेले अपनी जान पर
उन वीरों के सम्मान में
राष्ट्र के अभिमान पर


किया जिन्होंने जीवन अर्पित
उनको हैं ये शब्द समर्पित

समस्त देशवासियों को स्वतंत्रता दिवस (15 अगस्त) की हार्दिक शुभकामनायें।


विकास कुमार पाण्डेय 
नौबस्ता
कानपुर