Tuesday, July 28, 2015

संगीत का  साज हो  रणभेरी की  आवाज हो, 

संगीत का साज हो
रणभेरी की आवाज हो,
बादलों का राज हो
प्रेम का आगाज हो,




सभी में हैं ईश्वर की छाया,
सभी ने हैं परम तत्व को पाया,



पुष्प की खिलन हो,
प्रेमियों का मिलन हो,
शत्रुओं की जलन हो,
समाज का चलन हो,




सभी में हैं ईश्वर की छाया,
सभी ने हैं परम तत्व को पाया,



सागर की लहर हो,
समय का प्रहर हो,
चक्रवात का कहर हो,
नदी या नहर हो,




सभी में हैं.ईश्वर की छाया,
सभी ने हैं परम तत्व को पाया,




उपवन के फूल हो,
भूमि की धूल हो,
नागफनी के शूल हो,
शिखर या मूल हो,




सभी में हैं ईश्वर की छाया,
सभी ने हैं परम तत्व को पाया,



रत्नों की चमक हो,
स्वर्ण की खनक हो,
सूर्य की रमक हो,
विद्युत की दमक हो,





सभी में हैं ईश्वर की छाया,
सभी ने हैं परम तत्व को पाया,



पानी में नाँव हो,
पेड़ों की छाँव हो,
नगरों से दूर गाँव हो,
कौवे की काँव-काँव हो,




सभी में हैं ईश्वर की छाया,
सभी ने हैं परम तत्व को पाया,






Vikash Pandey

Kanpur

Saturday, July 11, 2015

ये माना  कि  धरा पर हम  राज करते नहीं, 

ये माना  कि
धरा पर हम
राज करते नहीं,
ऐसा नहीं की
हम किसी के
ह्रदय में
बसते नहीं,
कुछ ह्रदय के  
राज्य है हमारे लिये
राज वहाँ शासकों के
चलते नहीं,




सिंहासन मिट जायेगे,
मुकुट गिर जायेगे,
राज धरा का भी
एक दिन मिट जायेगा,






शासक ह्रदय के
कभी भी है
मरते नहीं,
राज अपना
नष्ट होने से
डरते नहीं,







यश हमारा ये
किवदंतियाँ
सुनाती रहेगी,
गाथा हमारी
सभी को
बताती रहेगी,



ये धन ये वैभव
सब मिट जायेगा,
नाम राजाओं के
कोई न दुहरायेगा,
भूल जायेंगे लोग
द्वारिकाधीश को
ग्वाला कृष्ण ही
जग में पूजा जायेगा,


Vikash Pandey

Kanpur

कुछ चिड़िया हमें देख चहचहाने लगी, 

कुछ चिड़िया हमें देख
चहचहाने लगी,
उपवन में है कोई
हस-हस के
सबको बताने लगी,




ये पंक्षी बहुत बदनाम है
जा जा कर
हर शाख पर
मेरे किस्से सभी को
सुनाने लगी,




कलियां हसने लगी
भांवरे हसने लगे,
पुष्प खिलने लगे
पत्ते हिलने लगे,







जिसने देखा मुझे
जिसने जाना मुझे
वो प्रेम, श्रद्धा से
झुकने लगे,




Vikash Pandey

Kanpur

Monday, July 6, 2015

हार गये जो मन रण से पहले,

हार गये जो मन
रण से पहले,
छोड़ गये जो
युद्धभूमि को
निर्णायक क्षण से
पहले,






उनकी क्या मैं
बात करूँ,
खुशियों के पल
क्यों बर्बाद करूँ,







वो हारे मन के योद्धा थे
रण का जिनमें था
जोश नही,
क्यों सम्मान करे
उनका जग
जग का इसमें
दोष नहीं,








जो कुँयें को ही
समझ बैठे है
सारा जग,
जिनके पास जग का
शब्दकोष नहीं,








जीता है उसने
जग को
जिसने है
हुँकार भरी,
योद्धाओं के
तीक्ष्ण बाणों से
जिसकी अन्तरात्मा
नही डरी,





Vikash Pandey

Kanpur

Sunday, July 5, 2015

हमने तो अभी कलम थामी है,

हमने तो अभी
कलम थामी है,
मेरे बारे में
कुछ कहना अभी
बेमानी है,
समय के शातिर
शिकंजे से
निकलकर
हमें अपनी भी
एक जमीन बनानी है,







तुम सोचते हो
हमारे भाग्य में
अंधेरे है,
मगर हमने तो
उजाले को भी
हराने की  ठानी है,






समय के पन्नों पर
लिखनी अपनी भी
एक कहानी है,







जो सहमा था
वो मेरा बचपन था
जिसने हवाओं से
लड़ने की ठानी है
वो मेरी जवानी है,
ऐ हवाओं मेरा
विरोध छोड़ दो
मेरे अतीत में
संघर्षों की एक
कहानी है,






Vikash Pandey

Kanpur