Monday, July 6, 2015

हार गये जो मन रण से पहले,

हार गये जो मन
रण से पहले,
छोड़ गये जो
युद्धभूमि को
निर्णायक क्षण से
पहले,






उनकी क्या मैं
बात करूँ,
खुशियों के पल
क्यों बर्बाद करूँ,







वो हारे मन के योद्धा थे
रण का जिनमें था
जोश नही,
क्यों सम्मान करे
उनका जग
जग का इसमें
दोष नहीं,








जो कुँयें को ही
समझ बैठे है
सारा जग,
जिनके पास जग का
शब्दकोष नहीं,








जीता है उसने
जग को
जिसने है
हुँकार भरी,
योद्धाओं के
तीक्ष्ण बाणों से
जिसकी अन्तरात्मा
नही डरी,





Vikash Pandey

Kanpur

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