Saturday, November 21, 2020

मेरे अधरों पर तुम गीत बनो

मेरे अधरों पर तुम गीत बनो,
मधु स्वर कविता मधु संगीत बनो,
सदा रहे मधु मेरे अधरों पर,
प्रिय मीत बनो, मेरी प्रीत बनो,


मेरे अधरों कि प्रिया हो आशा,
मेरे नैनों की तुम हो भाषा,
बसे हुये हो हृदय तुम ऐसे,
जैसे चातक जल का हो प्यासा,


हिय तल प्रणय प्रीत का भाव लिए,
तुम आओं प्रियतम के वास प्रिये,
तेरे सुकोमल मन की ज्योति से,
जल पड़ेंगे अमावस प्रेम दिये,


भेज रहा हूँ भावों का चन्दन,
अन्तस से है तेरा अभिनंदन,
दसों दिशाओं में हो यश तेरा,
जग करता तुम्हारा हो वंदन,



विकास पाण्डेय


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Monday, November 9, 2020

मुक्तक:- तुलसा- शालिगराम

जलंधर ने जब देव हराये,
विष्णु जी वृंदा के पास आये,
स्पर्श किया जब उस रानी का,
तुलसा- शालिगराम कहाये,



विकास पाण्डेय

Friday, October 9, 2020

बन चन्द्र निकला रातों में

बन चन्द्र निकला रातों में
निशा हुयी चंचल बातों में
बेला कुमुदिनी खिलने लगी
वनस्पति तालों प्रपातों में

चाह निशा की रमण के लिये
प्रियतम संग भ्रमण के लिये
वो चन्द्र के संग अलसायी
तम मरुथल में स्फुरण के लिये

निशा हुयी है पूर्ण समर्पित
सर्वस्व कर रही है अर्पित
प्रणय पाश में बंधकर करके
चन्द्र प्रिया बनकर है चर्चित


पुष्पित बेला है उपवन में
महक छा रही गांव व वन में
चन्द्र की चंचल किरणों से
प्रेम लहर बेला के तन में


बेला की सुगंध है ऐसे
भूल गयी मर्यादा जैसे
चर्चा उपवन में वो पायी
चन्द्र प्रियतमा हो वो जैसे


चन्द्र रूप जब नभ पर आया
धरा कुमुदिनी को मन भाया
सम जल में वो थिरक रही है
प्रियतम से हो स्पंदन पाया


रजत वर्ण से सज धज करके
प्रिय के रूप में रम करके
आनन्दित हो गयी कुमुदिनी
चन्द्र को हिय में रख करके


चन्द्र प्रभा आयी जब थल में
पुष्पित वस्पतियाँ थल जल में
चन्द्र रूप से मोहित होकर
वो नृत्य मग्न जल कल- कल में



भाव विभोर हुयी वनस्पतियाँ
जब प्रिय के संग वास किया
झूम उठी वो आनन्दित हो
जब नभ ने प्रिय संदेश दिया




विकास पाण्डेय

Saturday, August 15, 2020

अटल नाम का सूरज न हो वह सुबह नही होने देंगे

भारत सरकार के पूर्व माननीय प्रधानमंत्री, युग निर्माता, युग पुरुष, भारत रत्न श्रद्धेय श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी के जन्मदिन 25 दिसम्बर 2015 के अवसर पर  लिखी गयी अपनी छोटी सी कविता के माध्यम से उन्हें उनकी द्वितीय पुण्य तिथि के अवसर पर स्मरण करके सम्मान देना चाहूँगा।

 बन गये रत्न भारत के तुम
 ज्योतिपुंज आरती के तुम

 तुम्हारे विचारों की कोमल लताये
 हैं सर्वत्र लटक रही
 अपने प्याारे अटल के लिये
 मानवता है तडप रही

 क्यों अपनों से
 तुमने मुँह मोड लिया
 अपने सपनों की नौका को
 क्यों मझधार में छोड दिया

 राजनीति के गलियारों को
 तुमने ऐसे छोड दिया
 जैसे प्राणों ने जीवन से
 अपना नाता तोड लिया

 बन तपस्वी, बन वनवासी
 एकान्तवास के अभिलाषी

 मानवता के देवदूत
 भारत माँ के सपूत

 अटल नाम का सूरज न हो
 वह सुबह नही होने देंगे
 लाखों आँधी तूफान आये
 तुम्हारे आभा मण्डल की
 चमक नही खोने देंगे

 आने वाले युगों-युगों तक
 तुम्हें पुकारा जायेगा
 भारत भूमि का कण-कण
 अटल-अटल दुहरायेगा

 विकास पाण्डेय

Tuesday, August 11, 2020

मिलोगे तो दिखा देंगे कि दिल में दाग कितने हैं,

मिलोगे तो दिखा देंगे कि दिल में दाग कितने हैं,
बता देंगे जो पूछोगे यहां पर नाग कितने हैं,
मनाते हैं यहां खुशियां सुबह को शाम कह कर के,
यहां पर है धुनें कितनी यहां पर राग कितने हैं,

-विकास पाण्डेय

Sunday, July 19, 2020

अमर शहीद मंगल पाण्डेय जी को उनकी जयंती के अवसर पर इन शब्दों के साथ स्मरण

1857 की क्रान्ति के अग्रदूत एवं महानायक अमर शहीद मंगल पाण्डेय जी को उनकी जयंती के अवसर पर इन शब्दों के साथ स्मरण करते हैं-


मुक्त धरा है मुक्त गगन है
मुक्त है अपना दाना पानी
अंत हुआ गोरों का शासन
बन्द हुआ है कालापानी
नहीं रहा अब मनमानापन
भाग गये हैं अभिमानी
खुलकर उड़ते आज परिंदे
टूट गए हैं जाल ब्रितानी।

किया जिन्होंने जीवन अर्पित
उनको हैं ये शब्द समर्पित

Monday, July 13, 2020

सुनियें प्रिय केपी ओली जी

सुनियें प्रिय केपी ओली जी,
नेपाल की जनता भोली जी,
चीन पाक नहीं सगे हुये हैं,
सबको देते मीठीं गोली जी,



विकास पाण्डेय
कानपुर नगर
उ०प्र०

Sunday, June 21, 2020

वीर रस के मेरे चार मुक्तक - विकास पाण्डेय

1- 


सिकन्दर भी जहा रोया, मैं वो भारत की माटी हूँ,
जहा विचलित हुआ ग़ोरी, मैं वो वीरो की घाटी हूँ,
चटा दे धूल दुश्मन को, मैं वो भारत की थाती हूँ,
लिखा है प्रेम तलवारों पर, मैं वो वीरो की पाती हूँ,

-विकास पाण्डेय





2-



मैंने यह मुक्तक जुलाई 2017 में लिखा था। यह मुक्तक मंच में अन्तिम कवि के रूप में भी आने पर अपने प्रभाव को कम नहीं होने देता!




आतंक के आकाओं से कह दो-
हाहाकार मचा देंगे।
टूट गया जो धैर्य हमारा
नामोनिशां मिटा देंगे।

माँ भारती के बेटों का
शौर्य तुम्हें दिखा देंगे।
घुस करके आतंक के गढ़ में
भारतवर्ष बसा देंगे।

विकास पाण्डेय





3- 





चीन का कर डाला प्रतिकार,
विश्व में हो रही जय जयकार,
चीनी चमचे हैं शोक मना रहे, 
जयचंदों के यहाँ हाहाकार,



- विकास पाण्डेय




4-



मित्र बनाओ, मित्र रहेंगे
किया प्रहार, रणभूमि मिलेंगे
मिग, मिराज, सुखोई संग
चिनुक, अपाचे ले तुमसे भिडेंगे


- विकास पाण्डेय

मुक्तक

मैंने यह मुक्तक जुलाई 2017 में लिखा था। यह मुक्तक मंच में अन्तिम कवि के रूप में भी आने पर अपने प्रभाव को कम नहीं होने देता!




आतंक के आकाओं से कह दो-
हाहाकार मचा देंगे।
टूट गया जो धैर्य हमारा
नामोनिशां मिटा देंगे।

माँ भारती के बेटों का
शौर्य तुम्हें दिखा देंगे।
घुस करके आतंक के गढ़ में
भारतवर्ष बसा देंगे।

विकास पाण्डेय

Saturday, June 20, 2020

मौन परिग्रहण भावों का है

मौन परिग्रहण भावों का है,
सम्बन्ध सागर नावों सा है,
उर बसे हुये है प्रणय समर्पण
अंश न रंच दिखावों का है,



- विकास पाण्डेय

मित्र बनाओ, मित्र रहेंगे

मित्र बनाओ, मित्र रहेंगे
किया प्रहार, रणभूमि मिलेंगे
मिग, मिराज, सुखोई संग
चिनुक, अपाचे ले तुमसे भिडेंगे


- विकास पाण्डेय

Wednesday, June 17, 2020

चीन का कर डाला प्रतिकार

चीन का कर डाला प्रतिकार,
विश्व में हो रही जय जयकार,
चीनी चमचे हैं शोक मना रहे, 
जयचंदों के यहाँ हाहाकार,



- विकास पाण्डेय

Thursday, May 14, 2020

चन्द्र- निशा

चन्द्र निशा का मिलन हो रहा
चकित धरा है जगत सो रहा
बंधे हुये है प्रणय पाश में
निशा प्रेम में चन्द्र खो रहा


विकास पाण्डेय

Tuesday, April 28, 2020

जग कहता हैं क्यों कवि हूँ मैं

जग कहता हैं क्यों कवि हूँ मैं
किसी मन में बसी छवि हूँ मैं
रात्रि के जुगुनुओं उठो तो
गगन पर चमकता रवि हूँ मैं



विकास पाण्डेय

Thursday, February 13, 2020

फागुन की नरमी हैं

फागुन की नरमी हैं
होली की गरमी हैं
हाथों में रंग-गुलाल
बस थोडी बेशरमी हैं

विकास पाण्डेय

Tuesday, January 28, 2020

मुक्तक:- बसन्त रंग धरती, बसन्त रंग व्योम

बसन्त रंग धरती, बसन्त रंग व्योम,
बसन्त का खुमार, ऐसा जैसे रस सोम,
बसन्त से चपलता, बसन्त से तीखे नयन,
बसन्त करे पुलकित, सबका रोम - रोम,



विकास पाण्डेय

Saturday, January 25, 2020

आज गणतंत्र है

मुक्त अब तंत्र है
देश भी स्वतंत्र है
झूमों प्रसन्न हो
आज गणतंत्र है

प्रेम ही यंत्र है
दूर षड्यन्त्र है
रंग तीन तिरंगे
राष्ट्र के मंत्र है


विकास पाण्डेय

Sunday, January 19, 2020

मुक्तक:- वो पद और कद के प्यासे है

वो पद और कद के प्यासे है
हम हीरे से हुये तराशे है
हम धर्म निष्ठ व अनुरागी
और शकुनि के वो पाँसे से है



विकास पाण्डेय

माघ मास, नवमी, कृष्ण पक्ष योग आया

माघ मास, नवमी, कृष्ण पक्ष योग आया,
दो हजार पैतीस विक्रम संवत की छाया।
जब स्वाति विचरण कर रही नक्षत्रलोक,
चातक जातक बन धरा पर जन्म पाया।

माघ की दोपहर सूर्य की सरल आंच,
निरखी विद्वान रहे, जन्म लग्न बाच।
निरखी में पुष्प बरसे, सरहन देव हरषे,
मामा मामी आँगन, रहे हैं मोर नाच।

Wednesday, January 15, 2020

वो मेघ तो थे नही, जो दूत बन जाते

वो मेघ तो थे नही, जो दूत बन जाते
वो पंक्षी, क्यों न अपने पंख चलाते
वो चन्द्र पूर्णिमा कृष्ण पक्ष कैसे आते
क्यों मीत अमावस के बन प्रीत निभाते


चले पुष्प मार्ग हम, थे जो स्नेह लुटाते
वो कंकड कंटक पर, क्यों कष्ट उठाते
बसन्त के संग, जो पुष्प धरा थे खिलते
पतजड संग गले, वो आकर क्यों मिलते



विकास पाण्डेय

Friday, January 3, 2020

जीवन में मेरे कविता देखो

जीवन में मेरे कविता देखो
भोज पत्र पर सरिता देखो
स्थूल धरा पर रह कर जग में
सूर्य चन्द्र तक उड़ता देखो

अश्व कल्पना के संग लेकर
व्योम के पंख पकड़ता देखो
पात्र हुये प्रिय निकट जो मेरे
मिलती उन्हें अमरता देखो


विकास पाण्डेय

Wednesday, January 1, 2020

पौष मास ने सभा लगायी,

पौष मास ने सभा लगायी,
नाचे कंबल और रजाई।
काँप रहे हैं दादा दादी,
ठिठुर रहे भाई भौजाई।

ब्लोअर से कुछ राहत पायी,
सड़क चले तो आफत आई।
पहने जैकेट महफिल में हैं,
भूल गए सूट और टाई।


विकास पाण्डेय