वो मेघ तो थे नही, जो दूत बन जाते
वो पंक्षी, क्यों न अपने पंख चलाते
वो चन्द्र पूर्णिमा कृष्ण पक्ष कैसे आते
क्यों मीत अमावस के बन प्रीत निभाते
चले पुष्प मार्ग हम, थे जो स्नेह लुटाते
वो कंकड कंटक पर, क्यों कष्ट उठाते
बसन्त के संग, जो पुष्प धरा थे खिलते
पतजड संग गले, वो आकर क्यों मिलते
विकास पाण्डेय
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