मुक्त धरा है, मुक्त गगन है
मुक्त है अपना दाना पानी
अंत हुआ गोरों का शासन
बन्द हुआ है कालापानी
नहीं रहा अब मनमानापन
भाग गये हैं अभिमानी
खुलकर उडते आज परिन्दें
टूट गये है जाल ब्रितानी
किया जिन्होंने जीवन अर्पित
उनको हैं ये शब्द समर्पित
.
सीमा पर जो पड़े हुये हैं
प्रहरी बनकर खडे हुये हैं
शत्रु नही आने पायेगा
बन हिमालय अडे हुये है
राष्ट्रध्वज के नाम पर
जो खेले अपनी जान पर
उन वीरों के सम्मान में
राष्ट्र के अभिमान पर
किया जिन्होंने जीवन अर्पित
उनको हैं ये शब्द समर्पित
समस्त देशवासियों को स्वतंत्रता दिवस (15 अगस्त) की हार्दिक शुभकामनायें।
विकास कुमार पाण्डेय
नौबस्ता
कानपुर
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