Thursday, June 22, 2017

मुक्तक

मेरे चेहरे की चमक देखकर मुझसे दूर जाने लगे हैं।
कभी पास आने की जिद थी अब कतराने लगे हैं॥


अन्ना को चाहिये लोकपाल।
मुझको चाहिये ठोंकपाल।।



परीक्षा थी मेरे हौसले के परों की।
चाहत थी मुझे चांद पर घरों की।।



फागुन की नरमी हैं
होली की गरमी हैं
हाथों में रंग-गुलाल
बस थोडी बेशरमी हैं




मेरे गीतों में वो छाने लगे है,
मेरे सपनों में दुनियाँ बसाने लगे है।
कल तक जिन्हें चाहत थी दूर जाने की,
अब हमें सपनों में अपने बसाने लगे है॥




कलियों से खुशबू आयी हैं
तन मन में उमंग छायी हैं

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