Friday, July 26, 2019

मैं एक चातक जैसा हूं

मैं एक चातक जैसा हूं
मत पूछो कि मैं कैसा हूं
सावन भादों जमकर बरसे
पर पानी को चातक तरसे





स्वाति की बूंदों के कर्षण में
जंगल उपवन में वो भटके
मेघों की बरसात में जैसे
खाली पड़े घाट घट मटके





प्यासा जीवन प्यासा तन मन
घूमें लेकर वन उपवन
प्यू कहां प्यू कहां शोर मचाए
पानी मगर कहीं ना पाए






चातक की चाह को मेघों ने
स्वाति से आज विनय की है
जैसे प्रेम पथिक को प्रिय से
अपनी आस प्रणय की है।




विकास पाण्डेय

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