मैं एक चातक जैसा हूं
मत पूछो कि मैं कैसा हूं
सावन भादों जमकर बरसे
पर पानी को चातक तरसे
स्वाति की बूंदों के कर्षण में
जंगल उपवन में वो भटके
मेघों की बरसात में जैसे
खाली पड़े घाट घट मटके
प्यासा जीवन प्यासा तन मन
घूमें लेकर वन उपवन
प्यू कहां प्यू कहां शोर मचाए
पानी मगर कहीं ना पाए
चातक की चाह को मेघों ने
स्वाति से आज विनय की है
जैसे प्रेम पथिक को प्रिय से
अपनी आस प्रणय की है।
विकास पाण्डेय
मत पूछो कि मैं कैसा हूं
सावन भादों जमकर बरसे
पर पानी को चातक तरसे
स्वाति की बूंदों के कर्षण में
जंगल उपवन में वो भटके
मेघों की बरसात में जैसे
खाली पड़े घाट घट मटके
प्यासा जीवन प्यासा तन मन
घूमें लेकर वन उपवन
प्यू कहां प्यू कहां शोर मचाए
पानी मगर कहीं ना पाए
चातक की चाह को मेघों ने
स्वाति से आज विनय की है
जैसे प्रेम पथिक को प्रिय से
अपनी आस प्रणय की है।
विकास पाण्डेय
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