Saturday, June 20, 2015

मैं एक चातक जैसा हूँ,

मैं एक चातक जैसा हूँ,
मत पूछो कि मैं कैसा हूँ,
प्यास हूँ सावन भादों में,
जीता हूं सुन्दर यादों में,
चलता रहता हूँ सावन भादों के मौसम पाने को,
कब प्यास बुझाओगे अपनी सुनता रहता हूँ इस ताने को,
मैं एक चातक जैसा हूँ ,
मत पूछो कि मैं कैसा हूँ ,
शिशिर ने ठंडक से तड़पाया,
बसन्त ने पुष्पों से जलवाया,
ग्रीष्म ने अंगारे बरसाये,
तब जाकर सावन भादों आये,

मैं एक चातक जैसा हूँ,
मत पूछो कि मैं कैसा हूँ,
देख मेरे प्यासे होंठों को,
सावन की बूँदें बोल पड़ी,
हे! जोगी बता कैसे प्यास बुझेगी तेरी,
मेरी प्यास वेदना को देख,
स्वाती का ह्रदय पिघल गया,
बोली- हे! सावन की बूँदों,
जब वर्षा होगी मेरी,
Vikash Pandey
Kanpur

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