Monday, June 29, 2015

वर्षा की बूँदो के स्पर्श के स्पन्दन से,

वर्षा की बूँदो के
स्पर्श के स्पन्दन से,
लगता है जैसे
तपता तन लिपट गया हो
शीतल चन्दन से,



तपते तन को,
तपते मन को,




वर्षा की बूँदों की टप-टप
लगती है ऐसी
जैसे छन -छन हो पायल से,
जैसे खन - खन हो पायल से,



वर्षा की बूँदो के
स्पर्श के स्पन्दन से,
लगता है जैसे
तपता तन लिपट गया हो
शीतल चन्दन से,




भीगा तन है,
भीगा मन है,




मन मोर मयूरा बन करके
वर्षा की बूँदों से सज करके
भीगी धरती पर नाच रहा,
कोयल की कूँ-कूँ
चिडियों की चूँ-चूँ
लगती है ऐसे जैसे
वर्षा के स्वागत में
गीत मल्हार रहा,




पानी ले बादल घुमड़ रहे हैं,
जैसे योद्धा रण को उमड़ रहे हैं,





वन उपवन सब गीत गा रहे
वर्षा की बूँदों की अपनी
प्रीत गा रहे,
हार गयी सूरज की किरणें
बादलों की जीत गा रहे,



वर्षा की बूँदो के
स्पर्श के स्पन्दन से,
लगता है जैसे तपता तन
लिपट गया हो
शीतल चन्दन से,





Vikash Pandey

Kanpur

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