एक कली थी
अधखिली
जिसका रस था
महकने लगा
जिसे देख
भौंरा बहकने लगा
जिसके लिये
दिन में थका
रातों को जगा
भाग्य भौंरे का
इतना प्रबल
भी न था
पा सके तो उसको
इतना सबल
भी न था
अब भौंरो की
महफिल भी
सजने लगी
रस कली का
चखने की
शर्त लगने लगी
कौन जीतेगा
कौन हारेगा
किसी को कुछ भी
न था पता
उधर एक क्वाँरी भी
ब्याहता हुयी
रात आयी थी वो
जिसके सपने लिये
वो थी आयी हुयी
बिछ गयी वो कली
जा उसके पलंग पर
लग गया उसका रस
नवब्याहता के अंग पर
रात महकी किसी की
जान निकली किसी की
लग गयी पंखुडियाँ भी
एक एक कर
कोमल से तन से
जो बसी हुयी थी
कितने भौंरो के मन में
नही था उसके जैसा सौन्दर्य
किसी के पास
अब इस भुवन में
भौंरे भी सपने सजाते रहे
उसको पाने की अलख
जगाते रहे
आयेगी फिर नया जन्म
लेकर कली
यह बात उपवन को
बताते रहे
Vikash Pandey
Kanpur
अधखिली
जिसका रस था
महकने लगा
जिसे देख
भौंरा बहकने लगा
जिसके लिये
दिन में थका
रातों को जगा
भाग्य भौंरे का
इतना प्रबल
भी न था
पा सके तो उसको
इतना सबल
भी न था
अब भौंरो की
महफिल भी
सजने लगी
रस कली का
चखने की
शर्त लगने लगी
कौन जीतेगा
कौन हारेगा
किसी को कुछ भी
न था पता
उधर एक क्वाँरी भी
ब्याहता हुयी
रात आयी थी वो
जिसके सपने लिये
वो थी आयी हुयी
बिछ गयी वो कली
जा उसके पलंग पर
लग गया उसका रस
नवब्याहता के अंग पर
रात महकी किसी की
जान निकली किसी की
लग गयी पंखुडियाँ भी
एक एक कर
कोमल से तन से
जो बसी हुयी थी
कितने भौंरो के मन में
नही था उसके जैसा सौन्दर्य
किसी के पास
अब इस भुवन में
भौंरे भी सपने सजाते रहे
उसको पाने की अलख
जगाते रहे
आयेगी फिर नया जन्म
लेकर कली
यह बात उपवन को
बताते रहे
Vikash Pandey
Kanpur
No comments:
Post a Comment