चन्द्र की चंचल किरणें
आज भी हम तक आती है
कुछ पल सो लेते है
सारी रात जगाती है
चन्द्र की चंचल किरणें
अब भी मुझसे खेल रही है
जग के निष्ठुर नियमों
और तानों को झेल रही है
जिन किरणों ने मुझ पर
अपना सर्वस्व है वारा
कैसे निष्ठुर बनकर
मै उनसे करूं किनारा
वो प्रकाश से डर जाती है
ज्योतिपुंज से घबडाती है
Vikash Pandey
Kanpur
आज भी हम तक आती है
कुछ पल सो लेते है
सारी रात जगाती है
चन्द्र की चंचल किरणें
अब भी मुझसे खेल रही है
जग के निष्ठुर नियमों
और तानों को झेल रही है
जिन किरणों ने मुझ पर
अपना सर्वस्व है वारा
कैसे निष्ठुर बनकर
मै उनसे करूं किनारा
वो प्रकाश से डर जाती है
ज्योतिपुंज से घबडाती है
Vikash Pandey
Kanpur
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