Monday, June 22, 2015

चन्द्र की चंचल किरणें

चन्द्र की चंचल किरणें
आज भी हम तक आती है
कुछ पल सो लेते है
सारी रात जगाती है

चन्द्र की चंचल किरणें
अब भी मुझसे खेल रही है
जग के निष्ठुर नियमों
और तानों को झेल रही है


जिन किरणों ने मुझ पर
अपना सर्वस्व है वारा
कैसे निष्ठुर बनकर
मै उनसे करूं किनारा


वो प्रकाश से डर जाती है
ज्योतिपुंज से घबडाती है




Vikash Pandey


Kanpur

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